रविवार, जनवरी 09, 2011

दिस इज द हाईएस्ट साधना । ( अंतिम भाग



दिव्येंदु ने विनीत भाव से अरुणाभ से यह बात कही । क्योंकि अरुणाभ से आँखे मिलाने की उसकी हिम्मत नहीं हो रही थी । 
जबकि अरुणाभ का व्यक्तित्व इस तरह बदल गया था । उसने आवेग में आकर न तो दिव्येंदु से कुछ कहा और न ही स्विच ऑन किया । 
वह तो यह भी नहीं कह पाया । देखो  यह अरुणाभ का घर है । यहां अरुणाभ का हुक्म चलेगा । जब तक उसकी मर्जी होगी । तब वह यहाँ बैठकर पढ़ेगा ।
मगर अरुणाभ के मुँह से एक भी शब्द नहीं निकला । भीतर ही भीतर दिव्येंदु के इस तरह के व्यवहार से वह अपने आपको बहुत दुखी तथा अपमानित अनुभव कर रहा था । 
तब भी अपने क्रोध पर नियंत्रण करके एक अपराधी की तरह अपने कागज पत्र उठाकर ड्राइंग रुम की खटिया पर जाकर अपनी कहानी लिखना शुरु कर दिया । मगर आंतरिक अंतर्द्वंद्व ने उसको अस्थिर कर दिया था । तुरंत वह छत के ऊपर जाकर टहलने लगा । मन ही मन दिव्येंदु के विरुद्ध युद्ध की घोषणा का संकल्प लेते हुए आकाश की तरफ देखने लगा । लेकिन जब वह अपने कमरे में लौटा तो उसने देखा दिव्येंदु सो चुका था ।
अरुणाभ के योग साधना के अभ्यास के बारे में  दिव्येंदु जान चुका था । जब कभी भी अरुणाभ ध्यानावस्था में बैठने का प्रयास करता था । तब  दिव्येंदु जान बूझकर उसके पास जाने लगता था । उसके पैरों की आवाज सुनकर अरुणाभ की साधना भंग हो जाती थी । शायद दिव्येंदु को ऐसा लगता होगा कि योग साधना बच्चों का खेल हो । दिव्येंदु की उपस्थिति उसकी साधना में बारबार खलल पैदा कर रही थी । फिर अपने आप पर नियंत्रण कर उसने दिव्येंदु को कुछ नहीं बोला । 
ठीक ऐसे समय पर शिवानंद की किताब की वे बातें उसे याद आने लगती थी । योग साधना के लिए एक एकांत कमरा होना चाहिए । हमेशा खिड़की दरवाजे बंद होने चाहिए । कमरे के अंदर अपने इष्टदेव का एक फोटो या कोई प्रतिमा । ईसामसीह का चित्र । मदर मेरी का चित्र या काबा की मस्जिद का चित्र अवश्य होना चाहिए । जहाँ कमरे के भीतर योगाभ्यास के लिए एक कंबल बिछा देना चाहिए । घर के सारे कमरों में सुवासित अगरबत्तियाँ अवश्य जलानी चाहिए । 
इस बात पर भी ध्यान देना चाहिए कि कमरे के भीतर आलतू  फालतू सामान नहीं रखा जाए । वास्तव में ऐसा होना चाहिए कि जैसे ही हम कमरे के भीतर प्रवेश करे । वैसे ही वहाँ का शुद्ध वातावरण आपको अपनी तरफ आकर्षित कर ले । अगर किसी कारणवश आपको अलग से पूरा कमरा नहीं मिलता है । तो कोई बात नहीं । आप कमरे के किसी कोने में कपड़े से घेरकर एक छोटी सी जगह में अपने लिए उपासना गृह बना सकते हो ।


किताब की ये सारी बातें याद आते ही अरुणाभ का मन ग्लानि से भर गया । अगर दिव्येंदु उसके घर में नहीं रह रहा होता । तो शायद दिव्येंदु के कमरे को अपनी उपासना के लिए अलग से रख लेता । अब यह कमरा इस कार्य के लिए मिलना मुश्किल है । उसको बारबार ऐसा लगने लगा । मानो दिव्येंदु उसके ऊपर बोझ बनकर बैठा हुआ हो । तथा उसकी सारी इच्छाओं की चाबी उसने ले ली हो ।
बात यहाँ तक होती । तब भी कोई बड़ी बात नहीं थी । मगर दिव्येंदु ने बातों बातों में एक दिन उसकी योग साधना पर करारा व्यंग कस दिया । उसके उत्तर में अरुणाभ ने उसको प्राणायाम से लेकर ध्यान । धारणा और समाधि तक के सारे विषयों पर पर्याप्त प्रकाश डाला । उसके इस दर्शन का उपहास उड़ाते हुए दिव्येंदु ने उसका नया नामकरण कर दिया । मिस्टर शिवानंद ।
उसके अगले दिन प्रभात की शुभवेला में । अरुणाभ पदमासन लगाकर अपनी दोनो भृकुटियों के मध्य मन को स्थिर कर एकाग्रता की चरम अवस्था प्राप्त करने के लिए महाप्रभु जगन्नाथ के निराकार स्वरुप का ध्यान करने लगा । तभी उसका मन इधर उधर भटकने लगा । उसको लगने लगा । जैसे कोई उसके कान में जोर जोर से दिव्येंदु की नकल करते हुए चिल्लाकर बुला रहा हो । मि शिवानंद । मि शिवानंद ।
कानों के परदों से टकराकर इस आवाज की प्रतिध्वनि फैलती जा रही थी । मस्तिष्क से लेकर चेतना के उच्चतम स्तर तक ।
एकाएक अरुणाभ का ध्यान भंग हो गया । वह उठकर खड़ा हो गया । शिवानंद की किताब फिर उससे कहने लगी । उसने केवल तुम्हारे शरीर । मन और अहंकार का अपमान किया है । मगर तुम तो इन तीनों चीजों से ऊपर हो । तुम यथार्थ में वह नहीं हो । जिसे तुम समझ रहे हो  । उसने तुम्हारे असली स्वरुप का अपमान नहीं किया है । क्योंकि तुम्हारे असली स्वरुप में तो वह खुद भी शामिल है । सही शब्दों में उसने तुम्हारी चेतना के निम्न धरातल पर छिपे अहंकार का अपमान करके तुम्हारी सहायता की है । ताकि तुम अहंकार शून्य होकर अपनी योग साधना के मार्ग में तेजी से आगे बढ़ सको ।
शिवानंद की किताब से मिले मार्गदर्शन पर बहुत देर तक मन ही मन विचार विमर्श करने के बाद अरुणाभ इस निष्कर्ष पर पहुँचा कि आगे से वह ज्यादा से ज्यादा चुपचाप रहने की कोशिश करेगा । तथा दिव्येंदु के साथ कम से कम बातचीत करेगा ।
शिवानंद की किताब और आगे मार्गदर्शन करते हुए निर्देश देने लगी । लौकिक जगत को मिथ्या समझकर ही मनुष्य अपनी चेतना शक्ति का विस्तार कर सकता है । भूख और प्यास तुम्हारे शरीर और मन पर अपना आधिपत्य जमाकर रखती है । जब तुम अपनी प्रकृति । इच्छाशक्ति और अनुभूतियों के ऊपर नियंत्रण रखने की क्षमता में वृद्धि करोगे । तब तुम देखोगे । तुम्हारे भीतर एक अभूतपूर्व मानसिक शक्ति का विकास हो रहा है । और यह मानसिक शक्ति ही तुम्हारी साधना के लिए साध्य का काम करती है ।
शिवानंद की किताब का अनुकरण करते हुए जहाँ अरुणाभ ने अपनी खटिया के ऊपर केवल दरी को छोड़कर सारे बिछौने चद्दरों की पोटली बाँधकर खटिया के नीचे पटक दिया । वहाँ दिव्येंदु उसी दिन अपने सोने के लिए एक नरम सा गद्दा खरीदकर ले आया । तथा आधे घंटे तक उसकी तारीफ के पुल बाँधने लगा । जब दिव्येंदु घर की सफाई कर रहा था । तथा अरुणाभ की खटिया के नीचे मिली उस पोटली को उठाकर अपने बेडरुम के वेन्टीलेटर के पास दीवार में बनी अलमारी में पटक दिया ।
पोटली को इस तरह पटकना महज सामान्य बात हो सकती है । मगर अरुणाभ को लगा कि दिव्येंदु ने घृणा तथा अवहेलना के साथ एक बड़ा सा पत्थर उसके नीचे फेंक दिया हो । केवल दरी बिछाई हुई खाट के ऊपर सोते सोते अरुणाभ सोचने लगा । क्या दिव्येंदु के ऐसे व्यवहार के लिए प्रतिक्रिया व्यक्त करना उसके लिए उचित होगा ? क्यों नहीं होगा उचित ? निश्चित तौर पर उसे दिव्येन्दु के व्यवहार पर अपनी प्रतिक्रियाएँ व्यक्त करनी चाहिए । नहीं । नहीं । उसका क्रोध करना उचित नहीं है । कम से कम साधना पथ पर अग्रसर होने के लिए तो उचित नहीं है ।
ऐसे ही अन्तर्द्वन्द तथा दुविधा के बीच झूलते हुए वह शिवानंद की किताब पलटने लगा । उसके मस्तिष्क में शिवानंद की वह कविता घूमने लगी । एडॉप्ट । एडजस्ट । एकमोटेड । बीयर इनसल्ट । बीयर इन्जुरी । दिस इज द हाईएस्ट साधना ।
मगर ऐसी बहुत सारी छोटी मोटी घटनाएँ थी । जो अरुणाभ को बीच बीच में विचलित कर देती थी । जैसे दिव्येंदु का चिल्ला चिल्लाकर जोरजोर से पढ़ना । अरुणाभ के कहानी लिखने के समय में रेडियो चलाकर हिंदी फिल्मों के गीत सुनना । अपनी बड़ी बड़ी डींगें हाँकना कि उसने भी अपने बचपन में अच्छी अच्छी कहानियों की रचना की है इत्यादि । अरुणाभ के सारे हैंगरों पर दिव्येंदु ने अपने शर्ट पैण्ट टाँग दिए थे । इसलिए बाध्य होकर अरुणाभ को अपने कपड़े रस्सी के ऊपर लटकाने पड़ रहे थे । अरुणाभ के साबुन केस में दिव्येंदु अपना साबुन रख देता था । इसलिए अपना साबुन कागज में लपेटकर रखने के लिए अरुणाभ मजबूर हो जाता था । 
रात को ग्यारह बजे इधर उधर घूम फिरकर जब अरुणाभ घर लौटता था । तब नींद से उठकर दरवाजा खोलते समय दिव्येंदु उलटा पुलटा बोलने लगता था । इन सभी बातों को लेकर अरुणाभ का मन बुरी तरह से आहत हुआ था । हर समय शिवानंद की किताब उसे उपदेश देती थी  । अहंकार शून्य होने के लिए । स्वार्थ रहित होने के लिए तथा सारे सांसारिक सुख दुख से ऊपर उठकर स्थितप्रज्ञ हो जाने के लिए ।
एक बार जरुर शिवानंद की किताब के उपदेश अरुणाभ के ऊपर प्रभाव नहीं डाल सके । जब वह सायं भ्रमण करके रात को ग्यारह बजे घर लौटा । उसने देखा उसके घर के बाहर एक बड़ा सा ताला लगा हुआ था । ताला लगाकर दिव्येंदु कहीं बाहर गया हुआ था ।
अपने ताले की चाबी अरुणाभ दिव्येंदु को पहले से दे चुका था । मगर इस आधी रात को दूसरा ताला लगाकर दिव्येंदु किस तरह खुशी से बाहर चला गया ? सीढ़ी गिनते गिनते अरुणाभ नीचे उतर गया । तथा बाहर रास्ते पर चहलकदमी करते करते उसका इंतजार करने लगा । मगर दिव्येंदु का कोई ठिकाना नहीं था । इधर उधर चक्कर काटते काटते अरुणाभ बुरी तरह से हताश हो गया था । और दिव्येंदु के ऊपर उसका क्रोध बढ़ता ही जा रहा था । मन ही मन उसे कोसने लगा । 
इस बार उसने मन में निश्चय कर लिया कि जैसे दिव्येंदु घर लौटेगा । वह उसे स्पष्ट तौर पर घर खाली करने के लिए कह देगा । लेकिन अभी तक दिव्येंदु का कोई अता पता नहीं था । अंत में थक हारकर उसने अपने पडोसी नायर बाबू के घर का दरवाजा खटखटाया तथा आधी रात में उन्हें नींद से जगाकर । उनके घर के भीतर से होते हुए छत पर जाने की अनुमति माँगी । 
क्योंकि अरुणाभ के छत पर जाने के लिए सिर्फ दो ही रास्ते थे । एक अपने घर के अंदर से होकर । तथा दूसरा उसके पडोसी नायर के घर के अंदर से होकर ।
अपने पडोसी नायर की दया से भले ही वह अपनी छत के ऊपर जा पाया । मगर वहाँ भी कितनी देर वह दिव्येंदु का इंतजार करता ? शर्ट खोलकर बिना दरी के छत पर सो गया । इधर उधर की सोचते हुए दिव्येंदु को मन ही मन खूब कोसने लगा । यहाँ तक भगवान से उसके मर जाने की प्रार्थना करने लगा । 
रात भर आसमान में वह तारे गिनता रहा । मच्छरों के दंश से दुखी होकर इधर उधर लोटता रहा । थक हार कब वह सो गया । उसे पता ही नहीं चला । सुबह उठते ही गुस्से से आगबबूला होकर वह दिव्येंदु के पास गया । इससे पहले कि वह उसे डाँटता फटकारता ।  दिव्येंदु से दूसरा ताला लगाकर जाने का कारण जानना चाहा । तब दिव्येंदु ने निर्विकार भाव से उत्तर दिया कि उसे एक जरुरी काम से स्टेशन जाना था । और हड़बड़ी में उसे वह पुराने वाला ताला नहीं मिला । इसलिए उसने दूसरा ताला लगा दिया ।
दिव्येंदु का यह उत्तर सुनकर अरुणाभ ना तो उसको डाँट पाया । ना ही क्वार्टर छोड़कर जाने के लिए कह पाया । और ना ही उसका सामान बाहर फेंक पाया । उसके मुँह से बिलकुल भी आवाज नहीं निकली । वह पूरी तरह से निस्तब्ध था । केवल शिवानंद की कविता की स्वतः मन ही मन आवृत्ति होने लगी । अडॉप्ट । एडजस्ट । एकमोडेट ।
इसी तरह एक दिन और वह रात को ग्यारह बजे के आसपास घर लौटा । दरवाजा खटखटाने के काफी देर बाद दिव्येंदु ने चिटकनी खोली । जैसे ही वह ड्राइंगरुम में घुसा । दिव्येंदु उसके कान में फुसफुसाकर कहने लगा । अरुणाभ । मेरी एक गर्लफ्रेण्ड आई हुई है । आज रात वह इस घर में रहेगी । प्लीज । आज एक दिन और तू छत पर सो जा । बस एक दिन एडजस्टमेंट की बात है ।
गर्लफ्रेण्ड ? या कालगर्ल ? इस छोटे से राउरकेला जैसे शहर में ऐसी भी कोई गर्लफ्रेण्ड हो सकती है क्या । जो किसी जवान लड़के के साथ रात बिताएगी ? दिव्येंदु के बेडरुम का दरवाजा बंद था । कमरे में अँधेरा था । केवल पंखा चलने की आवाज सुनाई पड़ रही थी । ऐसी स्थिति में अरुणाभ को कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था । अपने कपड़े बदलने के बाद हाथ मुँह धोकर बिना कुछ कहे अपना सोने का सामान लेकर वह छत के ऊपर चला गया । जैसे ही वह छत के ऊपर पहुँचा । दरवाजा बंद होने के साथ साथ चिटकनी लगने की आवाज आई ।
दिव्येंदु के द्वारा इस तरह दरवाजा बंद करने की आवाज से वह गुस्से से जल भुनने लगा । अभी उसे क्या करना चाहिए ? फ्लैट में रहने वाले सभी लोगों को बुलाकर क्या उसे यह बता देना चाहिए कि दिव्येंदु एक चालू लड़की को इस क्वार्टर में लेकर आया है ?
पहले पहले तो वह यही करना चाहता था । मगर बाद में उसने अपने आपको यह करने से रोक लिया । छत के ऊपर मच्छरदानी लगाकर खाट के ऊपर दरी बिछाकर एक असहाय की भाँति अरुणाभ सो गया । वह क्वार्टर उसका अपना है । मगर वह शरणार्थी की जिंदगी जी रहा है ।
एक चालू लड़की के साथ दिव्येंदु कितने आराम से बेडरुम के अंदर सो रहा है । और कितने दिनों तक वह सहता रहेगा । अपने अपमान और अवहेलना की धूल को ? और कितने दिन ? नहीं । बहुत हो चुका । अब उसे विरोध करना ही पडेगा । वह कायर पुरुष नहीं है । जो दिव्येंदु द्वारा किए जाने वाले हर तरह के अत्याचार को सहन करेगा । वह भी एक इंसान है । उसकी भी कुछ अपनी व्यक्तिगत चीजें हैं । जिस पर उसका अपना अधिकार है । वह अपने इस अधिकार को क्यों तिलांजलि देगा ?
नहीं । इस बार वह दरवाजा खटखटाकर दिव्येंदु को बाहर बुलाएगा । तथा उस चालू लड़की के साथ घर के बाहर निकाल देगा । यह कहते हुए । जानते हो । मैं इस घर का मालिक हूँ । समझे या नहीं ? तुम पर दया कर बिना भाड़े यहाँ रहने की मैने अनुमति दी । इसका मतलब यह तो नहीं है कि..?
गुस्से से तमतमाकर अरुणाभ उठकर खड़ा हो गया था । वह दरवाजे की तरफ बढ़ने लगा था । जैसे ही वह दरवाजा खटखटाने वाला ही था । तभी उसे लगा कि अचानक किसी ने उसके पाँव पकड़ लिए हो । वह शक्तिहीन हो गया । हाथ उठाकर दरवाजा खटखटाने की भी ताकत नहीं बची थी । 
उसे लग रहा था । उसके तलवे पिघलते जा रहे हो । एक ठंडेपन की सिहरन उठती जा रही थी । तलवों से घुटनों की ओर । शिवानंद की किताब ड्राइंगरूम के भीतर रह गई थी । वरना उससे कुछ उपदेश । कुछ सान्तवना जरुर मिलती । या किताब से कुछ उपाय पता चल जाता । वह बहुत मुश्किल से कुछ बोलने की चेष्टा करने लगा । शिवानंद । मैं क्या करुँ । शिवानंद ? मगर अरुणाभ के मुँह से एक भी शब्द नहीं निकल पा रहा था । अरुणाभ पत्थर की मूर्ति की तरह ज्यों का त्यों खड़ा था । उसे बहुत कष्ट हो रहा था । उसके दोनों पाँव बर्फ की भाँति पिघलते जा रहे थे ।..( समाप्त । 

2 टिप्‍पणियां:

RAJEEV KUMAR KULSHRESTHA ने कहा…

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दीपक बाबा ने कहा…

कहानी कुछ अधूरा पण लिए हुए है. क्या हुआ ...

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