सोमवार, नवंबर 21, 2011

बृह्म रहस्य के चार महावाक्य

कृष्ण यजुर्वेदीय उपनिषद ( शुकरहस्योपनिषद ) में महर्षि व्यास के आग्रह पर भगवान शिव उनके पुत्र शुकदेव को चार महावाक्यों का उपदेश " बृह्म रहस्य " के रूप में देते हैं । वे चार महावाक्य -
1 ॐ प्रज्ञानं बृह्म 2 ॐ अहं बृह्माऽस्मि 3 ॐ तत्त्वमसि और 4 ॐ अयमात्मा बृह्म हैं ।
1 ॐ प्रज्ञानं बृह्म - इस महा वाक्य का अर्थ है - प्रकट ज्ञान बृह्म है । वह ज्ञान स्वरूप बृह्म जानने योग्य है । और ज्ञान गम्यता से परे भी है । वह विशुद्ध रूप । बुद्धि रूप । मुक्त रूप । और अविनाशी रूप है । वही सत्य । ज्ञान । और सच्चिदानन्द स्वरूप । ध्यान करने योग्य है । उस महा तेजस्वी । देव का ध्यान करके ही । हम मोक्ष को । प्राप्त कर सकते हैं । वह परमात्मा । सभी प्राणियों में । जीव रूप में । विद्यमान है । वह सर्वत्र । अखण्ड विग्रह । रूप है । वह हमारे । चित और अहंकार पर । सदैव नियन्त्रण करने वाला है । जिसके द्वारा । प्राणी देखता । सुनता । सूंघता । बोलता । और स्वाद अस्वाद । का अनुभव करता है । वह प्रज्ञान है । वह सभी में । समाया हुआ है । वही बृह्म है ।
2 ॐ अहं बृह्माऽस्मि । इस महा वाक्य का अर्थ है - मैं बृह्म हूँ । यहाँ अस्मि शब्द से । बृह्म और जीव की । एकता का । बोध होता है । जब जीव । परमात्मा का । अनुभव कर लेता है । तब वह । उसी का रूप । हो जाता है । दोनों के मध्य का । द्वैत भाव । नष्ट हो जाता है । उसी समय । वह - अहं बृह्मास्मि । कह उठता है ।
3 ॐ तत्त्वमसि । इस महा वाक्य का अर्थ है - वह बृह्म तुम्हीं हो । सृष्टि के । जन्म से पूर्व । द्वैत के । अस्तित्त्व से रहित । नाम और रूप से रहित । एक मात्र । सत्य स्वरूप । अद्वितीय - बृह्म । ही था । वही बृह्म । आज भी । विद्यमान है । उसी बृह्म को । तत्त्वमसि । कहा गया है । वह शरीर । और इन्द्रियों में । रहते हुए भी । उनसे परे है । आत्मा में । उसका अंश मात्र है । उसी से । उसका अनुभव होता है । किन्तु वह अंश । परमात्मा नहीं है । वह उससे दूर है । वह । सम्पूर्ण जगत में । प्रतिभासित होते हुए भी । उससे दूर है ।
4 ॐ अयमात्मा बृह्म । इस महावाक्य का अर्थ है - यह आत्मा बृह्म है । उस स्व प्रकाशित परोक्ष ( प्रत्यक्ष शरीर से परे ) तत्त्व को । अयं । पद के द्वारा । प्रतिपादित किया गया है । अहंकार से लेकर । शरीर तक को । जीवित रखने वाली । अप्रत्यक्ष शक्ति ही । आत्मा है । वह आत्मा ही । परबृह्म के रूप में । समस्त प्राणियों में । विद्यमान है । सम्पूर्ण चर अचर । जगत में । तत्त्व रूप में । वह संव्याप्त है । वही बृह्म है । वही । आत्मतत्त्व के । रूप में । स्वयं प्रकाशित । आत्मतत्त्व  है ।
अन्त में भगवान शिव शुकदेव से कहते हैं - हे शुकदेव ! इस सच्चिदानन्द स्वरूप । बृह्म को । जो । तप । और ध्यान द्वारा । प्राप्त करता है । वह जीवन मरण के । बन्धन से । मुक्त हो जाता है ।
भगवान शिव के उपदेश को सुनकर मुनि शुकदेव सम्पूर्ण जगत के स्वरूप परमेश्वर में तन्मय होकर विरक्त हो गये । उन्होंने भगवान को प्रणाम किया । और सम्पूर्ण प्ररिग्रह का त्याग करके तपोवन की ओर चले गये ।

इसका ज्ञान मेरे लिए वास्तव में विचित्र है

विचित्र - व्याघ्रीव तिष्ठति जरा परितर्जयन्ती । रोगाश्च शत्रव इव परिहरन्ति देहम ।
आयुः परिस्रवति भिन्नघटादिवाम्भो । लोकस्तथाप्यहितमाचरतीति चित्रम ।
वृद्धावस्था बाघिन की तरह गुर्राती सी सामने खड़ी है । शत्रुओं की भांति रोग शरीर पर प्रहार किये जा रहे हैं । दरार वाले फूटे घड़े से चू रहे पानी की तरह आयु क्षरण हो रहा है । फिर भी यह संसार ( जनसमूह ) अहितकर कार्यों में संलग्न रहता है । इस तथ्य का ज्ञान मेरे लिए वास्तव में विचित्र है ।
साधन पंचकम -
वेदो नित्यमधीयताम तदुदितं कर्म स्वनुष्ठीयतां । तेनेशस्य विधीयतामपचितिकाम्ये मतिस्त्यज्यताम ।
पापौघः परिधूयतां भवसुखे दोषोनुसंधीयतां । आत्मेच्छा व्यवसीयतां निज गृहात्तूर्णं विनिर्गम्यताम ।
वेदों का नियमित अध्ययन करें । उनमें कहे गए कर्मों का पालन करें । उस परम प्रभु के नियमों का पालन करें । व्यर्थ के कर्मों में बुद्धि को न लगायें । समग्र पापों को जला दें । इस संसार के सुखों में छिपे हुए दुखों को देखें । आत्म ज्ञान के लिए प्रयत्नशील रहें । अपने घर की आसक्ति को शीघ्र त्याग दें ।
संगः सत्सु विधीयतां भगवतो भक्ति: दृढाऽऽधीयतां । शान्त्यादिः परिचीयतां दृणतरं कर्माशु संत्यज्यताम ।
सद्विद्वानुपसृप्यतां प्रतिदिनं तत्पादुका सेव्यतां । बृह्मैकाक्षरमर्थ्यतां श्रुतिशिरोवाक्यं समाकर्ण्यताम ।
सज्जनों का साथ करें । प्रभु में भक्ति को दृण करें । शांति आदि गुणों का सेवन करें । कठोर कर्मों का परित्याग करें । सत्य को जानने वाले विद्वानों की शरण लें । प्रतिदिन उनकी चरण पादुकाओं की पूजा करें । बृह्म के एक अक्षर वाले नाम ॐ के अर्थ पर विचार करें । उपनिषदों के महावाक्यों को सुनें ।
वाक्यार्थश्च विचार्यतां श्रुतिशिरःपक्षः समाश्रीयतां । दुस्तर्कात् सुविरम्यतां श्रुतिमतस्तर्कोऽनुसंधीयताम ।
बृह्मस्मीति विभाव्यतामहरहर्गर्वः परित्यज्यताम । देहेऽहंमति रुझ्यतां बुधजनैर्वादः परित्यज्यताम ।
वाक्यों के अर्थ पर विचार करें । श्रुति के प्रधान पक्ष का अनुसरण करें । कुतर्कों से दूर रहें । श्रुति पक्ष के तर्कों का विश्लेषण करें । मैं बृह्म हूँ । ऐसा विचार करते हुए मैं रुपी अभिमान का त्याग करें । मैं शरीर हूँ । इस भाव का त्याग करें । बुद्धिमानों से वाद विवाद न करें ।
क्षुद्व्याधिश्च चिकित्स्यतां प्रतिदिनं भिक्षौषधं भुज्यतां । स्वाद्वन्नं न तु याच्यतां विधिवशात प्राप्तेन संतुष्यताम । शीतोष्णादि विषह्यतां न तु वृथा वाक्यं समुच्चार्यतां । औदासीन्यमभीप्स्यतां जनकृपानैष्ठुर्यमुत्सृज्यताम ।
भूख को रोग समझते हुए प्रतिदिन भिक्षा रूपी औषधि का सेवन करें । स्वाद के लिए अन्न की याचना न करें । भाग्यवश जो भी प्राप्त हो । उसमें ही संतुष्ट रहें । सर्दी गर्मी आदि विषमताओं को सहन करें । व्यर्थ वाक्य न बोलें । निरपेक्षता की इच्छा करें । लोगों की कृपा और निष्ठुरता से दूर रहें ।
एकान्ते सुखमास्यतां परतरे चेतः समाधीयतां । पूर्णात्मा सुसमीक्ष्यतां जगदिदं तद्वाधितं दृश्यताम ।
प्राक्कर्म प्रविलाप्यतां चितिबलान्नाप्युत्तरैः श्लिश्यतां । प्रारब्धं त्विह भुज्यतामथ परबृह्मात्मना स्थीयताम
एकांत के सुख का सेवन करें । परबृह्म में चित्त को लगायें । परबृह्म की खोज करें । इस विश्व को उससे व्याप्त देखें । पूर्व कर्मों का नाश करें । मानसिक बल से भविष्य में आने वाले कर्मों का आलिंगन करें । प्रारब्ध का यहाँ ही भोग करके परबृह्म में स्थित हो जाएँ ।

यह विश्व दर्पण में दिखाई देने वाली नगरी के समान है

विश्वं दर्पणदृश्यमाननगरीतुल्यं निजान्तर्गतम । पश्यन्नात्मनि मायया बहिरिवोद्भूतं यदा निद्रया ।
यः साक्षात्कुरुते प्रबोधसमये स्वात्मानमेवाद्वयम । तस्मै श्रीगुरुमूर्तये नम इदं श्रीदक्षिणामूर्तये ।
यह विश्व । दर्पण में दिखाई देने वाली । नगरी के समान है ( अवास्तविक है )  स्वयं के भीतर है । मायावश । आत्मा ही । बाहर प्रकट हुआ सा । दिखता है । जैसे नींद में । अपने अन्दर देखा गया स्वपन । बाहर उत्पन्न हुआ सा । दिखाई देता है । जो आत्म साक्षात्कार के समय । यह ज्ञान देते हैं कि । आत्मा एक है । उन श्रीगुरु रूपी श्री दक्षिणामूर्ति को नमस्कार है ।
बीजस्यान्तरिवान्कुरो जगदिदं प्राङनिर्विकल्पं । पुनर्मायाकल्पितदेशकालकलनावैचित्र्यचित्रीकृतम ।
मायावीव विजॄम्भयत्यपि महायोगोव यः स्वेच्छया । तस्मै श्रीगुरुमूर्तये नम इदं श्रीदक्षिणामूर्तये ।
बीज के अन्दर स्थित । अंकुर की तरह । पूर्व में निर्विकल्प इस जगत । जो बाद में पुनः माया से भांति  भांति के स्थान । समय । विकारों से चित्रित किया हुआ है । को जो । किसी मायावी जैसे । महायोग से । स्वेच्छा से उदघाटित करते हैं । उन श्रीगुरु रूपी । श्री दक्षिणामूर्ति को नमस्कार है ।
यस्यैव स्फुरणं सदात्मकमसत्कल्पार्थकं भासते । साक्षात्तत्त्वमसीति वेदवचसा यो बोधयत्याश्रितान ।
यत्साक्षात्करणाद्भवेन्न पुनरावृत्तिर्भवाम्भोनिधौ । तस्मै श्रीगुरुमूर्तये नम इदं श्रीदक्षिणामूर्तये ।
 जिनकी प्रेरणा से । सत्य । आत्म तत्त्व । और उसके असत्य । कल्पित अर्थ का । ज्ञान हो जाता है । जो अपने । आश्रितों को । वेदों में कहे हुए । तत्त्वमसि । का प्रत्यक्ष ज्ञान कराते हैं । जिनके साक्षात्कार के बिना । इस भव सागर से । पार पाना । संभव नहीं होता है । उन श्रीगुरु रूपी  श्री दक्षिणामूर्ति को नमस्कार है ।
नानाच्छिद्रघटोदरस्तिथमहादीपप्रभाभास्वरं । ज्ञानं यस्य तु चक्षुरादिकरणद्वारा बहिः स्पन्दते ।
जानामीति तमेव भांतमनुभात्येतत्समस्तं जगत । तस्मै श्रीगुरुमूर्तये नम इदं श्रीदक्षिणामूर्तये ।
अनेक छिद्रों वाले । घड़े में रक्खे हुए । बड़े दीपक के । प्रकाश के समान । जो ज्ञान । आँख आदि । इन्द्रियों द्वारा । बाहर स्पंदित होता है । जिनकी कृपा से । मैं यह जानता हूँ । कि उस प्रकाश से ही । यह सारा संसार । प्रकाशित होता है । उन श्रीगुरु रूपी । श्री दक्षिणामूर्ति को नमस्कार है ।
देहं प्राणमपीन्द्रियाण्यपि चलां बुद्धिं च शून्यं विदुः । स्त्रीबालांधजड़ोपमास्त्वहमिति भ्रान्ता भृशं वादिनः ।
मायाशक्तिविलासकल्पितमहाव्यामोहसंहारिण॓ । तस्मै श्रीगुरुमूर्तये नम इदं श्रीदक्षिणामूर्तये ।
स्त्रियों । बच्चों । अंधों । और मूढ के समान । देह । प्राण । इन्द्रियों । चलायमान बुद्धि । और शून्य को । मैं यह ही हूँ । बोलने वाले मोहित हैं । जो माया की शक्ति के । खेल से निर्मित । इस महान व्याकुलता का । अंत करने वाले हैं । उन श्रीगुरु रूपी । श्री दक्षिणामूर्ति को नमस्कार है ।
राहुग्रस्तदिवाकरेंदुसदृशो मायासमाच्छादनात । संमात्रः करणोपसंहरणतो योऽभूत्सुषुप्तः पुमान ।
प्रागस्वाप्समिति प्रबोधसमये यः प्रत्यभिज्ञायते । तस्मै श्रीगुरुमूर्तये नम इदं श्रीदक्षिणामूर्तये ।
राहु से गृसित । सूर्य और चन्द्र के समान । माया से । सब प्रकार से ढँका होने के कारण । कारणों के हट जाने पर । अजन्मा । सोया हुआ पुरुष । प्रकट हो जाता है । ज्ञान देते समय । जो यह । पहचान करा देते हैं कि । पूर्व में सोये हुए । यह तुम ही थे । उन श्रीगुरु रूपी । श्री दक्षिणामूर्ति को नमस्कार है ।
बाल्यादिष्वपि जाग्रदादिषु तथा सर्वास्ववस्थास्वपि । व्यावृत्तास्वनुवर्तमानमहमित्यन्तः स्फुरन्तं सदा ।
स्वात्मानं प्रकटीकरोति भजतां यो मुद्रया भद्रया । तस्मै श्रीगुरुमूर्तये नम इदं श्रीदक्षिणामूर्तये ।
बचपन आदि । शारीरिक अवस्थाओं । जागृत आदि । मानसिक अवस्थाओं । और अन्य । सभी अवस्थाओं में विद्यमान । और उनसे अलग । सदा । मैं यह हूँ । की स्फुरणा करने वाले । अपने आत्मा को । स्मरण करने पर । जो प्रसन्नता । एवं सुन्दरता से । प्रकट कर देते हैं । उन श्रीगुरु रूपी । श्री दक्षिणामूर्ति को नमस्कार है ।
विश्वं पश्यति कार्यकारणतया स्वस्वामिसम्बन्धतः । शिष्याचार्यतया तथैव पितृपुत्राद्यात्मना भेदतः ।
स्वप्ने जाग्रति वा य एष पुरुषो मायापरिभ्रामितः । तस्मै श्रीगुरुमूर्तये नम इदं श्रीदक्षिणामूर्तये ।
स्वयं के । विभिन्न रूपों में । जो विश्व को । कार्य और कारण सम्बन्ध से । अपने और स्वामी के सम्बन्ध से । गुरु और शिष्य सम्बन्ध से । और पिता एवं पुत्र आदि के सम्बन्ध से । देखता है । स्वपन और जागृति में । जो यह पुरुष । जिनकी माया द्वारा । घुमाया जाता सा लगता है । उन श्रीगुरु रूपी । श्री दक्षिणामूर्ति को नमस्कार है ।
भूरम्भांस्यनलोऽनिलोऽम्बरमहर्नाथो हिमांशुः पुमान । इत्याभाति चराचरात्मकमिदं यस्यैव मूर्त्यष्टकम ।
नान्यत्किञ्चन विद्यते विमृशतां यस्मात्परस्माद्विभोस्तस्मै । श्रीगुरुमूर्तये नम इदं श्रीदक्षिणामूर्तये ।
जो भी । इस स्थिर और । गतिशील जगत में । दिखाई देता है । वह जिसके । भूमि । जल । अग्नि । वायु । आकाश । सूर्य । चन्द्र । और पुरुष आदि । आठ रूपों में से है । विचार करने पर । जिससे परे । कुछ और । विद्यमान नहीं है । सर्वव्यापक । उन श्रीगुरु रूपी । श्री दक्षिणामूर्ति को नमस्कार है ।
सर्वात्मत्वमिति स्फुटिकृतमिदं यस्मादमुष्मिन स्तवे । तेनास्य श्रवणात्तदर्थमननाद्धयानाच्च संकीर्तनात ।
सर्वात्मत्वमहाविभूतिसहितं स्यादीश्वरत्वं स्वतः । सिद्ध्येत्तत्पुनरष्टधा परिणतम चैश्वर्यमव्याहतम ।
सबके आत्मा । आप ही हैं । जिनकी स्तुति से । यह ज्ञान हो जाता है । जिनके बारे में सुनने से । उनके अर्थ पर । विचार करने से । ध्यान और भजन करने से । सबके आत्मारूप आप । समस्त विभूतियों सहित । ईश्वर स्वयं । प्रकट हो जाते हैं । और अपने अप्रतिहत ( जिसको रोका न जा सके ) ऐश्वर्य से । जो पुनः । आठ रूपों में । प्रकट हो जाते हैं । उन श्रीगुरु रूपी । श्री दक्षिणामूर्ति को नमस्कार है ।

वल्लभाचार्य कृत चतुःश्लोकी

सर्वदा सर्वभावेन भजनीयो बृजाधिपः । स्वस्यायमेव धर्मो हि नान्यः क्वापि कदाचन ।
सभी समय । सब प्रकार से । बृज के राजा श्रीकृष्ण का ही स्मरण करना चाहिए । केवल यह ही धर्म है । इसके अतिरिक्त और कुछ भी नहीं ।
एवं सदा स्वकर्तव्यं स्वयमेव करिष्यति । प्रभुः सर्व समर्थो हि ततो निश्चिन्ततां बृजेत ।
इस प्रकार अपने कर्तव्यों का हमेशा पालन करते रहना चाहिए । प्रभु सर्व समर्थ हैं । इसको ध्यान रखते हुए निश्चिन्तता पूर्वक रहें ।
यदि श्रीगोकुलाधीशो धृतः सर्वात्मना हृदि । ततः किमपरं ब्रूहि लोकिकैर्वैदिकैरपि ।
यदि तुमने सबके आत्मस्वरुप गोकुल के राजा श्रीकृष्ण को अपने ह्रदय में धारण किया हुआ है । फिर क्या उससे बढ़कर कोई और सांसारिक और वैदिक कार्य है ।
अतः सर्वात्मना शश्ववतगोकुलेश्वर पादयोः । स्मरणं भजनं चापि न त्याज्यमिति मे मतिः ।  इति श्री वल्लभाचार्य कृत चतुःश्लोकी सम्पूर्णा ।
अतः सबके आत्मस्वरुप गोकुल के शाश्वत ईश्वर श्रीकृष्ण के चरणों का स्मरण और भजन कभी भी छोड़ना नहीं चाहिए । ऐसा मेरा ( वल्लभाचार्य का ) विचार है । इस प्रकार श्री वल्लभाचार्य कृत चतुःश्लोकी पूर्ण हुआ ।

मंगलवार, जुलाई 26, 2011

हिन्दुस्तान में थूकने और मूतने की खूली छूट है ।

सब्जी मन्डी की कसम । आज उस मास्टर का किस्सा खत्म कर ही देते हैं । मास्टर से अब मेरी बोलचाल न के बराबर है ।
लेकिन अभी भी मुझे कुछ छोटे छोटे अनुभव याद हैं । 
दिल्ली दर्शन के बाद, साल 2000 में जून महीने के पहले हफ़्ते में उस मास्टर ने फ़िर आकर कहा - त्रिपाठी जी ! क्या इरादा है । गर्मियों का मौसम है । सबकी छुट्टियाँ हैं । मैं आज तक अपने बच्चों को कभी " हिल स्टेशन " नही लेकर गया । इस बार " कुल्लू मनाली " चलें
मैं ठिठका । मैंने सोचा । कही ऐसा न हो जाये कि सस्ते के चक्कर में ये मास्टर किसी ऐसी जगह ले जाये । जहाँ आसपास


होटल ही न हो । और ये वहाँ बोल दे कि - रात ही तो काटनी है । सडक पर ही सो जाओ । हमने कौन सा सडक खरीद कर घर ले जानी है ।
फ़िर मैंने ये भी सोचा कि बाथरूम की जगह ये.. ये न बोल दे कि - त्रिपाठी जी ! बाथरूम की क्या समस्या है ? सब जगह बाथरूम ही तो है । जहाँ मर्जी कर लो । हिन्दुस्तान में थूकने और मूतने की खूली छूट है । राजीव राजा ! इन बातों के डर से मैंने उसके साथ उस दिन घूमने जाने से मना कर दिया ।

देखो राजा ! ये मास्टर भी कितना ना..यक आदमी है । मास्टर होकर भी कसरत करने वालों के खिलाफ़ है । कहता है । सिर्फ़ पी टी करो । मुझे आज भी अच्छी तरह याद है कि साल 2000 के दिसम्बर महीने के आखिरी हफ़्ते में मैं इसको अपने साथ 1 फ़िल्म दिखाने ले गया । मैंने सोचा । अकेला क्या जाऊँगा । मास्टर अपना पडोसी है । उसे साथ ले चलता हूँ । हम दोनों शाम वाला शो देखने चल पङे । मैंने टिकट खरीद ली । जब तक फ़िल्म शुरू नहीं हुई । तब तक मास्टर फ़िल्म के पोस्टर को बडे ध्यान से देख रहा था ।

खैर फ़िल्म शुरू हुई । इन्टरवल में मैंने मास्टर को काफ़ी पिलायी । मास्टर फ़िल्म खत्म होने तक चुपचाप रहा । जब फ़िल्म खत्म हुई । तब हम दोनों बाहर जाने को उठे ।
तब मास्टर अचानक बोल पङा - त्रिपाठी जी ! ये आप मुझे कैसी फ़िल्म में ले आये ?
मैंने मास्टर से कहा - भई ! कितनी पावरफ़ुल फ़िल्म थी । हीरो और विलेन दोनों की क्या जबर्दस्त बाडी थी ।
इतने में हम कार पार्किंग तक आ गये । कार में बैठकर जब हम घर को चल पङे । तब मास्टर मेरे को रास्ते में समझाने लगा ।
मास्टर बोला - त्रिपाठी जी ! बाडी वाडी से कुछ नहीं होता । जब मैं जवान था । तो 1 बार मैं फ़िजीकल का टेस्ट देने गया । मुझसे कहा गया कि - या तो 400 मीटर की दौङ लगाओ । या लोहे का गोला ( शार्टपुट ) फ़ेंक कर दिखाओ ।
तो मैंने सोचा कि - कौन साला दौङ

लगायेगा । ऐसे ही साले भगा भगा कर जान निकाल देंगे । ऐसा करता हूँ । गोला फ़ेंक कर घर को निकल लेता हूँ
जब मैं मैदान में पहुँचा । तो वहाँ 1 पहलवान टायप आदमी खङा था । उसकी बहुत बाडी थी । मुझे उसको देखकर डर लग रहा था । वो भी मुझे घूर रहा था । जब उसकी गोला फ़ेंकने की बारी आयी । तो उसने गोला फ़ेंका । उसका फ़ेंका गोला थोङी दूरी पर जाकर गिर गया । फ़िर मेरी बारी आयी
मैंने उस पहलवान की तरफ़ देखते हुए डरते डरते गोला उठाया । और फ़ेंक दिया । मेरा फ़ेंका गोला उस पहलवान के फ़ेंके हुये गोले से भी अधिक दूर गिरा । पहलवान हैरानी से मेरी तरफ़ देखने लगा ।

फ़िर मैंने उसे कहा - ये तो मैंने डरते हुये फ़ेंका था । अब मैं दोबारा इसे फ़ेंकूँगा । फ़िर तुम देखना कि ये कहाँ जाकर गिरेगा ।
मास्टर की बात सुनकर मैं सोचने लगा कि - तब भी तुमने कौन सा पाकिस्तान मे फ़ेंक देना था । 1 बात और याद आयी । मास्टर ने 1997 के आसपास 1 रिक्शे वाले को अपने घर किराये पर रख लिया । रिक्शे वाला दिन भर रिक्शा चलाता था । उसकी पत्नी लोगों के घरों में झाङू पोंछा लगाती थी । उन दोनों के 2 छोटे बच्चे थे । 1 लङका और 1 लङकी । रिक्शे वाले की पत्नी बहुत ही मोटी थी । रंग काला था । बिलकुल भैंस लगती थी । रिक्शेवाला भी बिल्कुल काला था । चेहरे पर हल्की मूँछे थीं । लेकिन उसने सर पर बाल संजय दत्त जैसे रखे हुये थे । लम्बे लम्बे । जैसे संजय दत्त ने 1991 मे बनी फ़िल्म " सङक " में रखे थे

वो अपने आपको संजय दत्त से कम नहीं समझता था ।
मेरे पास भी वो कभी न कभी आ जाता था । कई बार स्कूटर खराब होने पर मैं उसके रिक्शे पर ही कालेज चला जाता था । वो मुझे कहता था - त्रिपाठी जी ! मुझे पूजा भट्ट बहुत अच्छी लगती है । सङक फ़िल्म तो कमाल की थी । संजय दत्त की क्या एक्टिंग थी । फ़िल्म में जो गुंडा था । उसने हिजङे की क्या शानदार एक्टिंग की है । वो रिक्शे वाला फ़ैशनेबल था । अपने लम्बे बालों को दही से धोता था ।
1 दिन मास्टर ने मुझे कहा - ये साला रिक्शे वाला नालायक आदमी है । जितना कमाता है । उतना ही खर्च भी करता है ।

साला नालायक आदमी भविष्य के लिये कुछ बचत ही नहीं करता । ये साला शराब भी पीता है । और सूअर का मीट भी खाता है ।
मैंने कहा - मास्टर जी ! ये बेचारा गरीब आदमी है । इसने कौन सा बचत करके महल खङा करना है । या बच्चों को कुछ पढाना लिखाना है । ऐसे बहुत से लोग है । जिनका काम भगवान सहारे ही चल जाता है ( वैसे असल में सबका काम भगवान सहारे ही चलता है । पर किसी को पता नहीं चलता )
मैंने फ़िर उसे कहा - मास्टर जी ! इन लोगों की सोच सिर्फ़ इतनी ही होती है । बेचारा करे भी तो क्या करे । सारा दिन सङकों पर रिक्शा चलाना पङता है । अगर अपने कमाये हुए थोडे से पैसों से कुछ मजा कर भी लिया । तो इतना तो उसे अधिकार है । थोडा सा कमाते है । कभी कभी कुछ अच्छा खा पी लेते हैं ।
तब मास्टर बस लगा गाँधी और नेहरू के नाम पर भाषण देने ।
मैंने मन में कहा - जा अपनी....?
खैर 1 बार उस रिक्शे वाले का उस मास्टर से झगडा हो गया । बात यूँ हुई । 1 बार शाम को रिक्शे वाले का ससुर आ गया । उसका ससुर फ़ौज में जमादार टाइप नौकरी करता था । रिटायर हो चुका था । लेकिन अपने आपको रिटायर फ़ौजी अफ़सर से कम नहीं समझता था ।
उस दिन उन दोनों ( ससुर और दामाद ) ने दबाकर शराब पी । और रात को देर से घर लौटे । मास्टर ने उस रोज रात 10 बजे तक सब ताले वगैरह लगा दिये । रिक्शेवाला और उसका ससुर रात 10 बजे के बाद आये । लेकिन अन्दर कैसे जाते । ताले लगे हुये थे । उन्होंने बैल बजाई । लेकिन मास्टर ने गुस्से में दरवाजा नहीं खोला ।
रिक्शे वाले की पत्नी घर के अन्दर थी । और डरी हुई थी । तब शराब चङी होने के कारण रिक्शेवाले ने और उसके ससुर ने मास्टर को गन्दी गन्दी गालियाँ देनी शुरू कर दीं । रिक्शे वाले का ससुर तो यहाँ तक भी बोल रहा था कि - ओये मास्टर ! तू साला क्या चीज है । सिर्फ़ 2 पैसे का मास्टर है । मैं फ़ौज से रिटायर हुआ हूँ । तू बाहर निकल साले तेरी.......।

रिक्शे वाला भी बोल रहा था - अबे ओये मास्टर ! साले मैं तेरी औकात जानता हूँ । हिम्मत है । तो बाहर निकल भैण....
राजीव राजा ! अडोस पडोस वाले गवाह हैं । उस रात मास्टर बाहर नहीं निकला । सिर्फ़ अन्दर खिडकी से बिल्ली की तरह बाहर को ताक रहा था ( वैसे मास्टर अपने आपको बहुत बहादुर समझता है )
खैर, रिक्शे वाला और उसका ससुर मास्टर को रात के 12 बजे तक गालियाँ देते रहें । और फ़िर वहीं कहीं सङक पर सो गये ।
सुबह जब नशा टूटा । फ़िर शर्मिंदगी महसूस हुई । लेकिन उस सुबह मास्टर ने उस रिक्शे वाले को शराफ़त से कमरा खाली करने को कह दिया । रिक्शे वाले ने भी कमरा खाली कर दिया ।
वो रिक्शे वाला मुझे आज भी कहीं न कहीं दिख जाता है । मुझे देखते ही वो मेरे को सैल्य़ूट मारता है । मैं भी स्कूटर रोककर उसका हालचाल पूछ लेता हूँ ।
राजीव राजा ! मेरी आदत है । मैं अमीर गरीब का अधिक भेदभाव नहीं करता । जो भी प्यार से मिले । तो दिल 

खोलकर मिलता हूँ । मैं तो सिर्फ़ प्यार का दीवाना हूँ ।
मास्टर वैसे आजकल मास्टर नहीं रहा । वकील बन गया है । सिर्फ़ कुछ साल पहले की बात है ।
मास्टर की पत्नी बोली - हमारी बेटियाँ अभी तो छोटी हैं । लेकिन 1 दिन बङी हो जायेंगी । इनकी शादी भी करनी पङेगी । अगर आप वकालत की पढाई कर लो ( प्राइवेट तौर पर ) तो हमारा सामाजिक रूतबा बङ जायेगा । क्युँ कि टीचर की बेटी को अच्छा रिश्ता नहीं आयेगा ।
मैंने मन में सोचा - भैण च.......कैसे लोग हैं । टीचर को " पिलर आफ़ दी सोसाईटी " कहते हैं । सभ्य समाज की बुनियाद । लेकिन इन लोगों को अपने टीचर होने पर शर्म है
वैसे मैंने 1 बार मास्टर के मुँह से भी सुना था कि - त्रिपाठी जी ! उस समय बस जैसी नौकरी मिल गयी । हमने कर ली । सिर्फ़ दाल रोटी के लिये ।

वैसे मास्टर पुलिस वाले के बहुत खिलाफ़ रहता है । कहता है । ये लोग हमेशा ही गलत होते हैं ।
मैंने मन में कहा - जैसा समाज वैसी पुलिस । जब समाज ही गलत लोगों से भरा पङा है । तो सब कुछ गलत ही मिलेगा । चाहे पुलिस हो । चाहे मास्टर । चाहे बाबा ।
राजीव राजा ! पुरानी हिन्दी फ़िल्मों में जैसे हीरोइन का बाप बङा आदर्शवादी और अपनी बेटी से अँधा प्रेम करने वाला दिखाया जाता था । ये मास्टर भी कुछ कुछ ऐसा ही है । इसी अँधे प्रेम के चक्कर में इसने अपने पैर पर कुल्हाङी मार ली
हमारी कालोनी में 1 डाक्टरों का परिवार है । उस परिवार में सब लोग डाक्टर ही हैं । ये मास्टर उनसे बहुत प्रभावित है । शायद इस वजह से इसने सोच लिया होगा कि अपनी बङी बेटी को डाक्टर ही बनाऊँगा ।
दूसरा कारण ये हो सकता है कि ये अपने परिवार और ससुराल वालों को ये दिखाना चाहता हो कि मैं भी किसी से कम नहीं । क्युँ कि इन दोनों पति और पत्नी को इनके घर वालों ने प्रेम विवाह करने पर घर से बेदखल कर दिया था । इसलिये इन दोनों में कुछ हीन भावना भी छुपी हुई है । इसलिये अपनी बङी बेटी जो पढने में महाना..यक है ( वो सब कामों में ना...यक है । सिर्फ़ आशिकी को छोङकर ) उसने बङी मुश्किल से 12वीं पास की थी ।
मेडिकल में उस लडकी को सारे हिन्दुस्तान में किसी भी मेडिकल कालेज में एडमिशन नहीं मिली । किसी चूतिये के कहने पर मास्टर ने अपनी बेटी की एडमिशन नेपाल के किसी नये बने मेडिकल कालेज में करवा दी । मुझे किसी ने बताया है कि वो कालेज बनाने वाले केरला तरफ़ के हैं । वो लोग कम नम्बर वाले बच्चों को एडमिशन दे देते हैं ( मोटा पैसा लेकर ) और हर साल पास कर देते हैं । तो इस मास्टर ने अपनी बेटी की एडमिशन वहाँ 22 लाख ( पूरे 5 साल की फ़ीस खाने पीने सहित ) में करवा दी । पैसा उसने अपने छोटे से घर पर कर्जा लेकर लिया । लेकिन समस्या ये है कि वहाँ का पढा हुआ बच्चा यहाँ भारत में नौकरी नहीं कर सकता ।
उसे वहाँ से 5 साल पढाई करके यहाँ आकर 1 टेस्ट पास करना होगा ( जो बहुत ही कठिन किया गया है ) तब जाकर उसे डाक्टरी करने का लायसेंस मिलेगा । मास्टर की बेटी वैसे ही महा..लायक है । कुछ साल पहले जब मास्टर की बेटी शायद सातवीं या आठवीं कक्षा में थी ।
उसने मुझसे पूछा कि - अंकल जी ! भोपाल का " प्राइम मिनिस्टर " कौन है ?
मैं उसका प्रश्न सु्नकर हैरान हुआ । लेकिन बोला कुछ नहीं ।
देख लिया राजा । उस लङकी की समझ । मास्टर ने भावना में बहकर गलती ही की है । अब ऐसे 2 नम्बर में पढे लिखे और पास हुये लोग क्या काम करेंगे ।
इसी महीने की बात है । मैं ई टी वी मध्य प्रदेश चैनल पर खबरें सुन रहा था । मध्य प्रदेश के किसी छोटे शहर में 1 आदमी घायल हालत में लाया गया । किसी लेडी डाक्टर ने उसे चेक किया । और कहा - ये मर गया है । इस लाश को पोस्टमार्टम के लिये भेज दो ।
जब उसके रिश्तेदार उसे पोस्टमार्टम के लिये लेकर गये । तो पोस्टमार्टम करने वाले डाक्टर ने कहा - तुम लोग पागल हो । जो इसे यहाँ ले आये । ये तो जिंदा है ।
तब फ़िर उस मरीज के रिश्तेदारो ने हँगामा किया । और पुलिस में उस महिला डाक्टर के खिलाफ़ रिपोर्ट लिखाई । अब मैं ऐसे पढे लिखों से पूछूँ - सालो ! तुम्हारे बाप ने पढ लिख कर कौन से झन्डे गाङ दिये । जो तुम लोग पढ लिख कर उन्हें उखाङ दोगे ।
खैर.. मास्टर पागल है जाने दो । सावन को आने दो । पता नहीं उसका क्या होगा ? उसको 1 बडी अजीब सी बीमारी है । उसको पेशाब के साथ थोङा बहुत खून भी आता है । इसलिये उसका इलाज चल रहा है । इन्दौर से । इसलिये पिछ्ले कुछ समय से वो बाबा रामदेव का भक्त बना हुआ है । उसे उम्मीद है कि बाबा रामदेव जी उसका पेशाब के साथ खून निकलना बन्द कर देंगे... हा हा हा ।
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सभी चित्र और लेख - श्री विनोद त्रिपाठी । भोपाल । मध्य प्रदेश । ई मेल से ।

बुधवार, जुलाई 20, 2011

दिल्ली दर्शन मेरे साथ - विनोद त्रिपाठी 1

दुनियाँ लगती है बेकार । जब चङती है सतनाम की खुमारी । छापा जब तक न पङे । तब तक हर लडकी है कुमारी । जय हो शंकर भगवान की । जय हो भोलेनाथ की ।
बुल्ला को खुल्लम खुल्ला छापकर तुमने धोती को फ़ाडकर रुमाल कर दिया है । अब तुम राजीव राजा नहीं रहे । अब तुम दिलदार राजा हो गये हो । मैंने कहा था कि - मैं फ़िर आऊँगा ।
आज मैं फ़िर से 100% सच्चा अनुभव लेकर आया हूँ । विश्वास करना । इसमें 1% भी कल्पना नहीं है । आज की बात में न तो कोई तुमसे सवाल है । और न ही पाठकों को कोई सुझाव । ये सच्ची घटना सिर्फ़ 1 अनुभव है । ऐसा अनुभव जब 2 अलग अलग विचारों वाले लोग एक साथ कहीं जाये । तो फ़िर क्या होता है ?
मुझे आज भी अच्छी तरह याद है । मैं दिल्ली 1999 का गया हुआ हूँ । ( इस हिसाब से तो मैं दिल्ली 20वीं सदी का गया हुआ हूँ । जबसे 21वीं सदी शुरु हुई है । मैं दिल्ली जा ही नहीं पाया ) मुझे ये भी याद है कि उस दिन शुक्रवार था । और 25 दिसम्बर था । मैं झूठ नहीं बोल रहा । बेशक अपने अपने कैलेन्डर चेक कर

लो । मुझे उस पी टी मास्टर ने कहा था कि - त्रिपाठी जी ! आपके कोलेज को छुट्टियाँ हैं । और मेरे, मेरी पत्नी और बच्चों के स्कूलों को भी छुट्टियाँ हैं । तो चलो एक साथ कहीं घूमने चलते हैं ।
मैंने कहा - ठीक है चलो । लेकिन कहाँ चलें ?
तब वो बोला - दिल्ली ।
25 दिसम्बर 1999 शुक्रवार को मैं और मेरी पत्नी बिलकुल रेडी थे ( मेरे कोई औलाद नहीं है ) हम लोग पी टी मास्टर का इन्तजार कर रहे थे । तभी वो अपनी पत्नी और बेटियों के साथ आ गया ( उस समय उसकी बेटियाँ बहुत ही छोटी थी ) पी टी मास्टर नीले रंग की जींस और भूरे रंग का कोट पहन कर आया था । उसकी पत्नी पीले रंग के कसे हुये पंजाबी सूट में वो लग रही थी । मैंने सोचा - लगता है । आज तो चटाके पटाके हो जायेंगे ।

इतने में मेरा बाप भी कंगारू की तरह 1 टांग पर कूदता हुआ आया । और मास्टरनी को बार बार नमस्ते बुलाने लगा । मैंने मन में कहा - लूज कैरेक्टर ।
उसके बाद हम लोग कार में बैठे । उस समय मेरे पास मारूती 800 थी ( लेकिन आजकल सिर्फ़ स्कूटर जिन्दाबाद ही है ) जाते जाते मैंने अपने बाप और नौकर " पान्डु " को बोल दिया - खबरदार सालो ! अगर पीछे से खाली मकान का कुछ नाजायज फ़ायदा उठाया तो । मैं वापिस आकर चेक करुँगा ।
इतना कहकर हम लोग निकल लिये । मैं कार चला रहा था । मास्टर मेरी बगल वाली सीट पर था । मेरी पत्नी और मास्टरनी पीछे वाली सीटों पर । दोनों

बच्चियाँ उनकी गोद में थी । सामान पीछे डीगी में था । मैंने अलताफ़ राजा के गाने लगाये हुये थे । 1 - तुम तो ठहरे परदेसी साथ क्या निभाओगे 2 - इशक और प्यार का मजा लीजिये 3 - कर लो प्यार कर लो प्यार कर लो प्यार ।
जब कुछ घन्टे बीत गये । तो मास्टर अचानक बोल पडा - त्रिपाठी जी ! धन्य है मेरा जिगर । जो मैं आपके साथ बैठकर इतनी देर से ये गाने सुन रहा हूँ ।
मैंने शान्त मन से कहा - कोई और गाने लगा लेते हैं ।
तब तपाक से उसने अपने कोट की जेब से कैसेट निकाल कर मुझे दे दी । मैंने लगा दी । पता नहीं कहाँ से उठाकर लाया था । पुरानी राजकपूर की फ़िल्मों के बेकार गाने । मैं बोर हो रहा था । और वो खुश हो रहा था ।

जब दोपहर हुई । मैंने कहा - कहीं खाना खा लेते हैं ।
तब वो बोला - सामने ढाबा है । वहाँ कार रोक लो ।
मैंने कहा - वो तो ड्राइवरों का ढाबा लगता है । किसी अच्छी जगह रूकते हैं ।
तो वो बोला - सब जगह अच्छी ही होती है । यहीं रोक लो ( मेरे हिसाब से उसने जानबूझ कर वहाँ रूकवाया था । वो कंजूस है । हमेशा सस्ता काम ही करता है )
जब हम वहाँ खाना खाने बैठे । तो वो बोला - त्रिपाठी जी ! आर्डर दीजिये क्या खायेंगे आप ?
मैंने मन में कहा - आर्डर तो सा.. ऐसे माँग रहा है जैसे..."
इतने में ढाबे वाला लडका बोला - यहाँ सिर्फ़ दाल ही मिलेगी ।
इससे पहले मैं कुछ कहता । मास्टर बोल पडा - हाँ ले आओ । खैर, फ़िर वहाँ से खाना खाकर चल पडे । दिल्ली

पहुँचते पहुँचते अन्धेरा हो गया था ( सर्दियों मे धुँध के कारण शाम 5 या 6 बजे तक ही अन्धेरा हो गया था ) हम लोग दिल्ली से अनजान ही थे ।
मैंने कहा - अच्छा होटल कहाँ से ढूँढे ?
मास्टर बोला - ढूँढना क्या है । कोई भी चलेगा ।
समय बीत रहा था । मैंने किसी भीड भडके वाले बाजार में कार पार्क की । फ़िर होटल तलाशने लगे । बेकार सा बाजार था । बहुत ही भीड थी । हम लोग दुकानदारों से पूछ रहे थे । वहाँ दुकानों के उपर कमरे बने हुये थे ।
मास्टर बोला - त्रिपाठी जी ! यही रूक जाते हैं ।
मैंने कहा - ये तो आम कमरे हैं । किसी होटल में चलते हैं । वहाँ केबल टी वी भी होगा ।

मास्टर बोला - नहीं नहीं ये ठीक हैं ( मुझे पता था । वो सस्ते के चक्कर में बोल रहा था )
जब कमरा देखा । तो बेकार था । बाथरूम भी साफ़ नहीं था ।
मैंने मास्टर से कहा - ये ठीक नहीं है ।
तब मास्टर बोला - सब ठीक ही है । रात ही तो काटनी है । हमने कौन सा कमरा खरीद के घर ले जाना है । उस समय मैंने उसे मन में कितनी गालियाँ दी । ये सिर्फ़ मैं जानता हूँ । या भगवान ।
खैर कमरा ले लिया किराये पर । हमने वहाँ के आदमी से पूछा - खाने में क्या मिलेगा ?
तो वो साला उल्लू की दुम बोला - खाना नहीं हम देते । सिर्फ़ कमरा देते हैं ।
तब फ़िर हम लोग ( दोनों परिवार ) खाने के लिये किसी होटल की तलाश में निकले । मास्टर रास्ते में पराई औरतों को चोर आँख से देख रहा था । लेकिन मेरा उस दिन मूड ठीक नहीं था । रास्ते में घटिया किस्म के बाजार और दुकानें आ रही थी ।

तभी 1 सस्ता सा होटल नजर आया । मास्टर हम सबको बोला - बस आ जाओ । बन गया काम ।
खैर वहाँ खाना खाया । और वापिस अपने अपने कमरे में आ गये । मेरी पत्नी सो गयी थी । मैं सिगरेट पीते हुए खिडकी से बाहर देख रहा था । सोचा अगर अकेले ( मैं और मेरी पत्नी ) आये होते । तो किसी अच्छे होटल में रहते । जहाँ केबल टीवी होता । मैं आराम से पैग लगाता । फ़िर हम दोनों बढिया खाना खाते । मैंने उस दिन फ़ैसला कर लिया था कि - इस मास्टर के साथ दोबारा कभी भी कहीं भी घूमने नहीं जाऊँगा । इस बार तो मैं फ़ँस गया । मैंने 1 बात वहाँ नोट की । रात के 11 बजने वाले थे । लेकिन फ़िर भी सडकों पर भीड और शोरगुल बहुत था ।

मैंने सोचा । दिसम्बर की रात को इतना शोरगुल और भीड । पता नहीं गर्मियों में कितनी भीड होती होगी ? उस दिन दिल्ली के प्रति मेरे मन में नफ़रत के भाव से बन गये थे । मैं सोने की कोशिश करते हुए, दिल्ली की तुलना अपने मध्य प्रदेश से करने लगा । खास कर भोपाल और लाला लाजपत राय नगर ( जहाँ मैं रहता हूँ ) से ।
सुबह हुई । मास्टर किसी पास की दुकान से चाय ले आया था । मेरी पत्नी ने साथ में लाये हुये बिस्कुट के पैकेट को खोल लिया । मैंने मास्टर को कहा - मैडम जी । एलिना और स्टेफ़ी ( उसकी बेटियों के नाम ) ने चाय पी ली ?
तब मास्टर बोला - हाँ  उन लोगों ने अपने कमरे में ही पी ली थी ।
मैंने मन में सोचा - रात को सा.. ने चटाके पटाके किये होंगे ।
मैंने कहा - मास्टर जी ! नाशते का क्या इरादा है ?

तब वो बोला - नाशता क्या ? नाशता ही नाश्ता है । हम जैम साथ में ले आये हैं । मैं ब्रेड का पैकेट ले आता हूँ । बढिया नाशता करेंगे ।
मैने सीधा कह दिया - मास्टर जी ! आप बच्चों वाली बात मत कीजिये । कहीं चलकर ठीक से नाशता कर लेते हैं ।
खैर मैंने उस हराम के ढक्कन को मना लिया । लेकिन मैं मन में बार बार सोच रहा था कि कहाँ इस ... के चक्कर में फ़ँस गया । हम लोग पूछ्ते पूछते " पराँठे वाली गली " में पहुँच गये । वहाँ सरदार लोगों की दुकानें थी । सिर्फ़ पराँठे की । हम भी बैठ गये 1 जगह । बहुत ही बढिया पराँठे थे । 1 प्लेट में 2 पराँठे थे । साथ में 2 किस्म के अचार और 2 किस्म की चटनी । 22 रुपये प्लेट थी । मास्टर भी नखरे करता हुआ 3 पराँठे खा ही गया ।
उसके बाद हम लोग दिल्ली घूमे । जितना हम घूम सकते थे । हम लाल किला पहुँचे । वहाँ मास्टर अपने बच्चों को देशभक्ति की नकली कहानियाँ सुना रहा था । वहा अंग्रेज भी आये हुये थे ।
मास्टर की छोटी बेटी अपने बाप को पूछती - पापा ये लोग कौन हैं ? ( उसका इशारा अंग्रेजो की तरफ़ था )
तब मास्टर बोला - ये अंग्रेज लोग हैं ।
उसकी बेटी ने फ़िर पूछा - क्या ये लोग यहाँ पर रहते हैं ?
तब मास्टर थोडा गुस्से में बोला - क्या करना है । इनको यहाँ रख कर । बडी मुश्किल से तो निकाले हैं । खैर उसके बाद हम लोग जन्तर मन्तर चले गये । वहाँ भी मास्टर अपनी बेटियों को ग्यान और विग्यान का भाशन देता रहा । फ़िर हम लोग कनाट प्लेस जैसी जगहों पर भी हो आये । बडी शानदार जगह थी ।

मैंने सोचा । जिस जगह हमने कमरा किराये पर लिया है । वो जगह तो बडी थर्ड क्लास है । लेकिन ये जगह तो फ़र्स्ट क्लास है । यहाँ तो बहुत ही अमीर लोग रहते होंगे । मैंने बडे शौक से वहाँ की शानदार बिल्डिंगे देखी । और खुश हुआ । लेकिन मास्टर वहाँ खुश नजर नहीं आ रहा था ( बेचारा पैदायशी सस्ती सोच वाला आदमी है )
दुपहर भी ढल चली थी । मैंने कहा - मास्टर जी ! क्या इरादा है ? खाना कहाँ खाना है ।
तब वो बोला - खाना क्या ? सुबह कर तो लिया था ।
मैंने कहा - सुबह किया था । उसके बाद पैदल भी कितना घूमे । अब शाम के 4 बजने वाले हैं । कोई छोटी मोटी चीज ही खा लो ।

तो मास्टर बेमन से चल पडा । इस बार मुझे मौका मिल गया । मैं उसे किसी अच्छे से रेस्टोरेन्ट में ले गया । वह बडा डरते डरते घुस रहा था । वहाँ मैंने अपनी मन पसन्द चीज का आर्डर दिया ( मैं बाजारी खाना वैसे तो कम ही खाता हूँ । लेकिन मुझे मद्रासी डोसा बहुत पसन्द है ) लेकिन उस ढक्कन ने वही काम किया । उसने अपने लिये ब्रेड सेन्डविच ही मंगवाये । उसके बाद हम वापिस कमरे में आ गये । हम लोग थक चुके थे । मैंने जब देखा कि मास्टर और उसकी पत्नी अपने कमरे में आराम कर रहे हैं । तो मैं चुपचाप जाकर किसी पास की दुकान से शराब की छोटी बोतल ले आया । साथ में नमकीन का छोटा पैकेट । मैंने आराम से बैठ कर शराब पी ( मेरी पत्नी बेचारी उस समय आराम कर रही थी ) मैं शराब पीते हुए सोच रहा था कि हमारे मध्य प्रदेश में यहाँ के मुकाबले कही अधिक शान्ती है । भोपाल में कितने ही ताल हैं । घाट हैं । खास कर हमारा " लाल लाजपत राय नगर " बिलकुल 1 कोने में होने के कारण वहाँ सन्नाटा और शान्ती है ।
कृमशः

दिल्ली दर्शन मेरे साथ - विनोद त्रिपाठी 2

मैंने 1 बात और भी नोट की । दिल्ली में 1 तरफ़ तो बेहद बाजारु माहौल है । और दुसरी तरफ़ कुछ जगह ऐसी भी हैं । जो बहुत शानदार और महँगी है । जहाँ बहुत ही अमीर लोग रहते हैं । असली महा सेठ । आज के जमाने के ।
खैर मैंने आराम से शराब खत्म की । शराब मैंने जानबूझ कर मास्टर और उसकी पत्नी के सामने नहीं पी । क्युँ कि वो दोनो पति पत्नी शराब विरोधी हैं । उसकी पत्नी जवाहर लाल नेहरू की भक्त है । कहती है - शराब के अलावा दुनियाँ में और कोई अवगुण नहीं ।
खैर, मास्टर रात को 8 और 9 के बीच फ़िर आ गया । मैंने कहा - मास्टर जी ! खाना कब खाने चलें ?
तो मास्टर बोला - खाना खा तो लिया था ।
मैंने कहा - कब ?

तो वो बोला - शाम को ।
मैंने कहा - शाम को 4 बजे खाया था । अब रात के 9 बजने वाले हैं ।
उसने कहा - मैंने नहीं खाना ।
मैंने कहा - भाई साहेब ! लेकिन मैंने जरुर खाना है । मैंने कहा - चलो अब चलते हैं आओ ।
मास्टर बोला - मैं साथ चल पडता हूँ । मेरी पत्नी और बेटियाँ नहीं जायेंगी । उन्हें भूख नहीं है । वो लोग आराम कर रहे हैं ।
तो फ़िर हम 3 लोग चल पडे ( मैं मेरी पत्नी और मास्टर ) लेकिन मास्टर लेकर फ़िर वहीं गया । सस्ते होटल में । खैर मैंने और मेरी पत्नी ने खाना खाया । मास्टर वहाँ आते जाते ग्राहकों को देखता रहा । फ़िर हम वापिस अपने अपने कमरों में आ गये । मेरी पत्नी आते ही सो गयी ।
मैंने सिगरेट जला ली । और खिडकी से बाहर देखने लगा । मैंने सोचा । मास्टर चटाके पटाके कर रहा होगा । उस

रात फ़िर सडक पर बहुत भीड थी । जो मुझे बिल्कुल भी अच्छी नहीं लग रही थी । मैं अपने घर के पास लाला लाजपत राय के नाम पर बने सरकारी पार्क के बारे में सोचने लगा । मैं सोच रहा था कि छोटे शहरों में बने बडे सरकारी पार्कों का अलग ही महत्व है । फ़िर मैं कल्पना करने लगा कि बढिया सरकारी पार्क के बाहर चाट पकोडी की रेहङी पर 2 सुन्दर और तन्दुरस्त लडकियाँ ( कोलेज में पढने वाली ) चाट खा रही हों । पास में ही किसी पान की दुकान पर मैं खडा सिगरेट पी रहा हूँ । दुकान पर पडे रेडियो पर 1991 में बनी फ़िल्म " फ़ूल और कांटे " का गाना चल रहा हो - ये दिल तेरे लिये ही मचलता है...तुम ही हो जिस के लिये दिल मरता है ।
फ़िर मैं नगर पालिका के बनाये हुए सरकारी पार्कों की कल्पना करते करते सो गया ।
अगले दिन फ़िर वही पराँठे वाली गली में नाशता किया । फ़िर हम लोग घूमने निकले । घूमते घूमते हम लोग दिल्ली के मशहूर बाजार पालिका बाजार चले गये । वहाँ मास्टर दुकानो में घुस कर चीज उठाता । और कीमत पूछने पर सामान नीचे रख देता । वहाँ फ़ालतू के सवाल जवाब कर रहा था । दुकानदारों को पूछ रहा था कि - इन चीजों का इतना रेट क्युँ है ? किस हिसाब से है ?
मैंने मन में कहा - तूने लेना देना कुछ है नही । बस ऐसे ही ...।
फ़िर हम वहाँ से निकल कर दुपहर को कुतुबमीनार देखने चले गये । वहाँ अंग्रेज लोग भी आये हुए थे । जिन्हें देख कर मास्टर का मूड खराब हो गया था ( शायद ) उस जगह आसपास और भी पुरानी बडी इमारतें बनी हुई हैं । मैंने वैसे ही कह दिया - देखो मास्टर जी क्या शानदार बिल्डिंग है । बेशक पुरानी है । लेकिन अभी भी इसकी शान है । बनाने वाले ने कितनी कलाकारी और मेहनत से बनाई होगी ।
वो बोला - होगी शानदार । उससे हमें क्या । हमने कौन सा इसे खरीदना है ।
मेरे दिल में तो आया कि ... को 1... लगा दूँ । लेकिन परवीन बाबी ( मास्टर की पत्नी ) के नाराज होने का खतरा था ।
खैर, फ़िर हमने किसी से पूछा कि - भई हम लोग यहाँ नये हैं । क्या कोई और अच्छी जगह है । घूमने के लिये ।
तो किसी ने कहा कि - फ़लाँ जगह पर 1 बहुत बडा " लोटस टेम्पल " बना है ।
मेरी पत्नी बेचारी बिलकुल ही साधारण और कम पढी लिखी है । टेम्पल का नाम सुनते ही कहने लगी - वहाँ चलते हैं ।

हम सब लोग पहुँच गये । लोटस टेम्पल । वहाँ 1 बहुत बडा खाली हाल कमरा था । बस । आसपास पार्क जैसी जगह थी । जब हम लोग हाल कमरे में पहुँचे । तो वहाँ पर कुछ नहीं था । बस अजीब सा साज सजावट का सामान रखा हुआ था । पता नहीं ये मन्दिर शायद जैन धर्म के लोगों का था । या किसी और का । 1 साला चूसे हुए आम जैसा पहरेदार सबको बोल रहा था - एक्सक्यूज मी जेन्टलमैन ! साईलेंस प्लीज । शान्ति ।
मैंने मन में कहा - शान्ति की नहीं । क्रान्ति की जरुरत है ।
फ़िर हम सब लोग उस बडे से कमरे से निकल कर बाहर पार्क में आ गये । मैं उस पार्क को देखकर, उस पार्क की तुलना लाला लाजपत राय के नाम पर बने हमारे घर के पास वाले पार्क के साथ कर रहा था । खैर, वहाँ पर कुछ भारतीय लोग वहाँ आये अंग्रेज लोगो के साथ

मिन्नत वगैरह करके उनके साथ अपनी फ़ोटो खिंचवा रहे थे । तब मास्टर और मास्टरनी भी मौके पर चौका लगा कर अपनी और अपने बच्चों की तसवीर अंग्रेज लोगों के साथ खिंचवाने में कामयाब हो गये । फ़ोटो खिंचवाते समय मास्टरनी गर्व से अपना सीना फ़ुलाये खडी थी ।
मैंने मन में कहा - ये हुई न बात ।
तब मास्टर बोला - त्रिपाठी जी ! आप भी आ जाईये ।
मैंने कहा - कोई बात नहीं । मैं जरा पेशाब कर के आया ।
मैंने जाकर गुस्से में पेशाब कर दिया । तुम युँ समझो कि बस बाथरुम को बरबाद कर दिया । मैं ये भी सोच रहा था कि मास्टर कल तो अपनी बेटी को बोल रहा था कि - इन अंग्रेजों को बडी मुशकिल से बाहर निकाला था । लेकिन आज सा.. ये खुद अपने परिवार सहित उन अंग्रेजो की बगल.. में घुसकर फ़ोटो खिंचवा रहा है ।

फ़िर मैं वापिस पार्क में आ गया । वहाँ किसी से पता लगा कि ये शायद कोई प्राइवेट संस्था की जगह है । मैंने सोचा कि दिल्ली में जगह की कमी है । इतने एकड जमीन पर ये फ़ालतू सा कमरा बनाकर और आसपास घास फ़ूस लगाकर कौन सा कमाल कर दिया । सरकार भी जो काम रोकना है । उसको रोकती नहीं । बस इधर थूक लगा देती है । और उधर तेल लगा देती है ।
सारे जहाँ से अच्छा हिन्दुस्ताँ हमारा । रहने को घर नहीं फ़िर भी सारा जहाँ हमारा ।
लानत है । उसके बाद मास्टर बोला - बच्चों को अप्पू घर दिखाना है ।
मैंने कहा - चलो ।
हम जब अप्पू घर पहुँचे । तो अन्धेरा हो चुका था ।
मास्टर बोला - त्रिपाठी जी ! कौन सा झूला झूलना है ?

मैंने कहा - मेरा ब्लड प्रेशर हाई रहता है । मैं नही झूलूँगा ।
मैं और मेरी पत्नी काफ़ी पीने के लिये साइड पर किसी बेंच पर बैठ गये । मास्टर और मास्टरनी में थोडा सा झगडा भी होना शुरु हो गया । उनके बच्चे किसी झूले पर बैठने की जिद कर रहे थे । लेकिन उस झूले के टिकट की कीमत ज्यादा थी । इसलिये उनमें बहस चल रही थी ।
मास्टरनी बोल रही थी - मैं 1 छोटे बच्चे के लिये इतना महँगा टिकट नही खरीदूँगी ।
मास्टर की छोटी बेटी लगातार रोये जा रही थी । मैंने मन में कहा कि - जब खर्चा करने की औकात नहीं । तो खर्चे वाली जगह पर क्यों..?
खैर, मैंने वहाँ पर 1 बात नोट की । वहाँ अप्पू घर में बहुत ही सुन्दर सुन्दर लडकियाँ घूम रही थी । प्रेमी जोडे भी बहुत थे । समझ नहीं आ रहा था कि किसको देखूँ । और किसको न देखूँ । कई प्रेमी जोडे तो सिर्फ़ 16, 17 या 18 साल तक के भी थे ।
राजीव राजा ! विश्वास करो । मैंने उनको गन्दी नजरों से नहीं देखा । मैं तो हैरान था कि इतने सुन्दर सुन्दर चेहरे एक साथ । लडकियाँ बहुत सुन्दर, गोरी, चिकनी और मुलायम किस्म की थी । लेकिन जो साथ में लडके थे । वो सब साले " कमर हिलाकर डिस्को और पप्पी लेकर खिसको " स्टायल के ही थे ।
मैं उन लडको की तुलना अपने शहर के लडके " जयकिशोर " से करने लगा । जयकिशोर नाम का लडका उस अखाडे में कसरत करने आता है । जिस अखाडे का मालिक मेरा दोस्त है । जयकिशोर 20 साल का है । बिलकुल ही साधारण घर से है । लेकिन उसके विचार साफ़ और नेक हैं ।
मैं सोच रहा था कि कहाँ हमारा जयकिशोर और कहाँ - ये साले टमाटर के बीज । लेकिन मुझे 1 हैरानी थी कि इन

लडकियों के माँ बाप इतनी ठंड में इतनी रात को इन्हें घर से दूर दोस्तों और सहेलियों के साथ घूम कर आने की इजाजत कैसे दे देते हैं ।
राजीव राजा ! वहाँ पर ( अप्पू घर में ) छोटे छोटे पार्क टायप स्थानों पर बडे बडे पेड भी लगे हुये हैं । और उन दिनों धुँध बहुत थी । मैं सोच रहा था कि कहीं सा.. ये दिल्ली के हरा.. लडके किसी लडकी के साथ धक्का न कर दें । लेकिन मुझे शक था कि जिस तरह लडकियाँ इनके साथ चिपक चिपक कर चल रही हैं । ये उनकी पप्पी पुप्पी जरुर ले लेते होंगे । मैं उठकर घुमने के बहाने इधर उधर टहलने लगा । मेरा इरादा था कि किसी कच्चे प्रेमी जोडे को रंगे हाथों चूमाचाटी करते हुये पकड लूँ । उसके बाद लडकी को तो जाने के लिये कह दूँगा । लेकिन उस लडकों को राशन पर भाशन दे डालूँगा ।
मैं कहूँगा - बेटा ! तुम्हारे घर पर तेरा पापा बैठा फ़ीकी चाय पी रहा होगा । और तुम यहाँ आईसक्रीम चाट रहे हो । लेकिन ऐसा हो नहीं सका ।

मास्टर आकर बोलने लगा - चलो त्रिपाठी जी ! अब लेट हो रहे हैं । सुबह जल्दी उठना है ।
मैंने कहा - चलो ।
फ़िर हम सब कार में बैठे । और वापिस अपने कमरे की तरफ़ आने लगे । इस बार मास्टर खुद ही बोल पडा - त्रिपाठी जी ! खाना रास्ते में खाकर फ़िर कमरों की तरफ़ चलते हैं । नहीं तो पहले कमरे में जायेगे । फ़िर वापिस खाना खाने आयेंगे । इससे टाइम फ़िजूल जायेगा ।
मैंने कहा - ठीक है ।
फ़िर हम खाना खाकर अपने अपने कमरों में आ गये । मेरी पत्नी बेचारी थकी हुई होने के कारण आते ही सो गयी । मैं सोच रहा था कि मास्टर पता नहीं आज रात चटाके पटाके करेगा या नहीं ?
क्युँ कि मास्टर और मास्टरनी में झगडा हो गया था ( अप्पू घर में ) लेकिन मैं आज खुश था । क्युँ कि अगली

सुबह हमारी भोपाल वापिस रवानगी थी । बस अगली सुबह हम लोग जल्दी उठकर बिना नाशता किये सिर्फ़ चाय पीकर वापिस भोपाल को हो लिये । मैंने फ़िर वापिसी पर अपनी पसन्द के ही गाने लगाये । नाशता हमने रास्ते में कर लिया ( हल्का फ़ुल्का ) और दुपहर का खाना इस बार मेरा कहना मानते हुये सबने किसी अच्छे रेस्टोरेन्ट में ही किया । भोपाल पहुँचते पहुँचते अन्धेरा हो चुका था ।
मास्टर ने कहा - हम रात का खाना रास्ते में पैक करवा लेते हैं । मैंने कहा - तुम लोग पैक करवा लो । हमारे यहाँ तो हमारा " पान्डु " है ।
मास्टर बोला - ठीक है ।
मैंने कहा - मैं तुम्हे अपने दोस्त के ढाबे से खाना पैक करवा देता हूँ ।
मेरे इतना कहने पर वो सा.. हरा.. का ढक्कन मास्टर मेरे को समझाने के स्टायल से बोला - त्रिपाठी जी ! ये साले बिजनेसमैन किसी के दोस्त वोस्त नहीं होते । आज तक कभी कोई बिजनेस मैन किसी का सच्चा दोस्त साबित नहीं हुआ ।
मैं परवीन बाबी ( मास्टर जी की खूबसूरत पत्नी ) के कारण चुप रहा । फ़िर वही हुआ । जो होना था । मास्टर ने किसी सस्ती जगह से सांडे के तेल में बनी दाल फ़्राई और रोटी पैक करवा ली । फ़िर मैंने मास्टर और उसके परिवार को उनके घर छोडा । और अपने घर आ गया । मेरे घर पर मेरा बाप और नौकर पान्डु बैठे आग सेक रहे थे ( ठंड से बचने के लिये )
मैंने अपने बापू से पूछा - हमारी गैर-हाजरी में सब ठीक ठाक रहा ?
मेरा बाप मेरे को 1 आँख बन्द करके बोला - बहुत बढिया ।
मैंने सोचा । मेरी गैर-हाजरी में इन सालों ने कहीं किसी के चटाके पटाके तो नहीं कर दिये ?
खैर फ़िर हम सब लोग खाना खाकर सो गये । अगले दिन मैं आराम से सोकर उठा । मुझे मेरी कालोनी का शान्त वातावरण और सर्दियों की सुनहरी धूप बहुत सुकून दे रही थी । मैं उस दिन शाम को 4 बजे से पहले पहले अपने दोस्त " बटुकनाथ लल्लन प्रसाद " के अखाडे में पहुँच गया । उसका अखाडा मेरे घर से तो दूर है । लेकिन शहरी

भीड भाड से थोडा अलग थलग ही है । वहाँ बैठकर मैंने अपने दोस्त ( अखाडे के मालिक ) के साथ बैठकर खालिस दूध की चाय पी । मेरे दोस्त ने अखाडे के पास ही भैंसे भी रखी हुई हैं । चाय के साथ नारियल के लड्डू भी खाये । अखाडे के आसपास का वातावरण बहुत अच्छा है ।
खुले खेत । लम्बे लम्बे पेडों की भरमार । गरीब । साधारण लेकिन अच्छे विचारों वाले भारतीय नौजवानों को वहाँ देसी कसरत करते हुये देखना मुझे बहुत अच्छा लगा । मैं वहाँ बैठा सोच रहा था कि इस 5 तत्व के पुतले ( जो आत्मा का वस्त्र हैं ) ने 1 दिन मिट्टी में ही मिट्टी हो जाना है । लेकिन सामने कसरत कर रहे नौजवान पहलवान जिन्दा रहते हुये ही कैसे मिट्टी से मिट्टी हो रहे हैं । वहाँ थोडी देर बैठने के बाद मैं अपने स्कूटर पर वहाँ से बाजार को चल दिया । रास्ते में पान की दुकान पर मुझे मेरा बाप सिगरेट पीता हुआ दिख गया । मैंने उसके पास जाकर स्कूटर रोक दिया । मेरा बाप कूदकर मेरे स्कूटर के पीछे बैठ गया । फ़िर मैंने अपना स्कूटर दौडा दिया । सब्जी मन्डी की तरफ़ ।

शनिवार, जून 25, 2011

मैं जवानी में अपने आपको " विनोद खन्ना " से कम नही समझता था ।

आशिक पुकारो । आवारा पुकारो । मैंने की है मुहब्ब्त दिल से । अब ना रूकेंगे हम किसी से । मैंने की है मुहब्ब्त दिल से ।
क्या हाल है पप्पू ? तुमने पिछ्ली बार मेरी पहली बार फ़ोटो छापकर मेरा दिल खुश कर दिया । आखिर मैं तेरा अंकल हूँ । असल में मैं जगत अंकल हूँ । मैं हूँ अंकल न. 1 ।
मैं आज तेरे को बडी दिलचस्प फ़ोटो भेज रहा हूँ । ये फ़ोटो खींचने में भी एक कहानी है । तू तो जानता ही है कि मैं भोपाल का रहने वाला हूँ । अरे मैं तो सूरमा भोपाली हूँ । मैं एक दिन बस अड्डे के पास वाले पुराने पुल के उपर से जा रहा था । मैं अपने स्कूटर पर था ।
तभी अचानक मेरे सामने जा रहे आटो वाले ने अचानक ब्रेक मार दी । मैं उसके बिल्कुल पीछे था । मुझे भी फ़टाफ़ट ब्रेक लगानी पडी । मैं गिरते गिरते बचा । मैं स्कूटर से उतरा । और सीधा जाकर उस साले आटो वाले के पिछ्वाडे पर लात मारी ।
आटो वाले ने मुझे कहा - क्या हो गया ?
मैंने सीधा ही एक चांटा उसको मारा । और कहा - तेरी ......"
तब वो आटो वाला बोला - ओये भाईसाहब......"
मैंने एक चांटा और मारा और कहा - तेरी ब......."
आटो वाला फ़िर बोला - बात सुन लो भाईसाहब ! गाली मत देना बता देता हूँ ।
( शायद उसके कहने का मतलब ये था कि बेशक चांटे लगा लो । लेकिन गाली मत देना । आटो ड्राइवर हूँ । तो क्या हुआ । आखिर मेरी भी तो कोई इज्जत है - हो हो हो हो हो हो )
इतने में साला कोई और बूढा वहाँ से जा रहा था । उसने रूककर कहा - हाँ भई क्या बात हो गयी ?
मेरा मूड पहले से ही खराब था । मैंने सीधा ही कहा - तू कौन है बे पूछने वाला ?
वो तो साला चुपचाप वहाँ से खिसक लिया ( साला महात्मा गांधी की औलाद )  इतने में आटो वाला भी भाग गया था ।

तब मैं भी स्कूटर उठाकर पुल से नीचे उतरा । मैं अपना मूड ठंडा करने के लिये रेहडी पर नींबू पानी पीने के लिये रूक गया । तभी मुझे दूर से 1 अजीब सा आदमी आता दिखा । मैंने उसकी फोटो खींच ली ।
बडी अजीब सी हँसी वाली फोटो है । जो देखेगा खुश हो जायेगा ।
अच्छा पप्पू ! मैंने पहले ठीक से ध्यान नहीं दिया । मैं पिछ्ले काफ़ी दिनो से ब्लाग ठीक से पढ नही पाया था । मैं किसी जरूरी काम में फ़ँसा हुआ था । अब अचानक 2 दिन पहले मैंने 1 तेरे लेख को देखा । तेरे को कोई खस्सी टायप आदमी कुछ पूछ रहा था । उसको शायद कुछ चाहिये था । कह रहा था कि फ़ूल चाहिये या गमला चाहिये ?
पप्पू डरना मत । तेरा अंकल विनोद त्रिपाठी सडक छाप गुन्डागर्दी का शेर है । जवानी में मैं 400 बैठक और 250 डन्ड लगा लेता था । अरे मध्य प्रदेश का हूँ । असली घी खाकर बडा हुआ हूँ । 
इन सालों की तरह नकली मिलावटी टमाटर सौस खाकर बडा नही हुआ । उसकी शक्ल देखकर तो लगता है कि वो खुद अपनी पतलून को ही सही नहीं कर पाता होगा ।
इधर मैं 50 साल के आसपास हूँ । फ़िर भी तेरी अभी भी 2 आन्टीया है । एक सरकारी और दूसरी गैर-सरकारी । तुम विश्वास नही करोगे । अभी भी मैं वैसे 6 चूहों पर अकेला भारी हूँ ।
मैं असली जिन्दगी में अकेला ही शक्ति कपूर । किरन कुमार और गुलशन ग्रोवर के बराबर हूँ । मैं अपने एरिया में अभी भी सडकछाप गुन्डागर्दी का त्रिदेव हूँ ।
अब कहूँ कि न कहूँ ......कसम सब्जी मन्डी की...... लेकिन आज कह ही देता हूँ । सुन ले पप्पु तेरा तो मैं अंकल हूँ । लेकिन मैं हर किसी का अंकल नही हूँ । मेरे पडोसी शर्मा जी की बेटी " लिजा " मेरे को एक दिन कहती ( जब मैं घर से बाहर खडा सिगरेट पी रहा था )  " अंकल टाइम क्या हुआ है ? "
तब मैंने कहा - धुत ! कौन अंकल । हम तो तुम्हारे फ़्रेन्ड है ।
हाय हाय पप्पु ! क्या करुँ । इलायची कूट के । लंगर लूट के । आजकल गर्मी बहुत है । कहीं दिल नहीं लगता । अब सुनो इस लेख के साथ ये नयी फोटो और साथ में मेरी वो वाली पुरानी फोटो भी.. ही ही ही छाप देना । यार फ़िर भी मेरे को इतना बुरा मत समझो । मैं जवानी में अपने आपको " विनोद खन्ना " से कम नही समझता था ।

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प्रस्तुतकर्ता - श्री विनोद त्रिपाठी प्रोफ़ेसर । भोपाल । मध्यप्रदेश । ई मेल से ।

शनिवार, मई 07, 2011

तेरा बाप भी इम्पोर्टिड है ।


अब मैं कहूँ कि न कहूँ । कसम सब्जी मन्डी की । मैंने सोचा रविवार आने वाला है । तो मैं भी कुछ लिखकर भेजूँ । ताकि ब्लागर्स का कुछ मनोरंजन हो जाये । तो लीजिये । आज " श्री विनोद त्रिपाठी जी " फ़िर 1 बार भारत के किसी छोटे शहर के कालेज का आखों देखा हाल ( लेकिन कल्पना के आधार पर ) बताने जा रहे हैं ।
आज से तकरीबन 20 साल पहले की बात है । किसी अच्छे से छोटे से शहर के कालेज की बात है । उस शहर में 1 ही कालेज था । वहाँ लडके और लडकियाँ एक साथ पढते थे ।
वहाँ उन दिनों 1 नवीन नाम का लडका भी BA में पढता था । वो किसी छोटे मोटे सेठ का लडका था । नवीन देखने में भी ठीकठाक था । लेकिन अपनी औकात से ज्यादा अपने आपको दिखाने की कोशिश करता था । उसकी बहुत सी लडकियो से भी दोस्ती थी । सिर्फ़ दोस्ती ! जो उस माहौल में आम बात थी ।
तभी उस कालेज में 1 नयी लडकी ने दाखिला लिया । जिसका नाम पूनम था । पूनम गाँव की रहने वाली थी । वो 12वीं तक अपने गाँव के सरकारी स्कूल में ही पढी थी । लेकिन BA करने के लिये उसे शहर आना पढा । इस शहर में उसकी बुआ रहती थी । और BA पूरी होने तक पूनम को अपनी बुआ के पास ही रहना था । सिर्फ़ छुट्टियों में ही गाँव आना जाना रखना था ।
जब पूनम का कालेज में पहला दिन था । तो उसे देखकर कालेज के लडकों की तो दिल की धडकन तेज हो गयी ।
पूनम का चेहरा देखने में बहुत सुन्दर था । उसकी आँखें बडी बडी थी । उसका चेहरा भी काफ़ी भरा हुआ था । होता भी क्युँ ना । पूनम गाँव की रहने वाली थी । जन्म से लेकर अब तक ( 18 साल की होने तक ) पूनम गाँव की साफ़ और शुद्ध वायु में पली बडी थी । घर के शुद्ध और असली दूध । मलाई । घी । मक्खन ने उसकी खूबसूरती और तन्दुरस्ती में 4 चाँद लगा दिये थे ।
उसका कद लम्बा और शरीर बहुत भरा हुआ था । उसका शरीर 18 साल की उमर में ही किसी युवा औरत की तरह खिल गया था । बेचारी शहर की ब्रेड और टमाटर सौस खाने वाली दुबली पतली लडकियाँ पूनम के सामने बौनी ही नजर आतीं ।
पूनम की खूबसूरती ने कालेज के लडकों का जीना हराम कर दिया था । लडके अक्सर सोचते कि पूनम इतने साधारण कपडों में भी इतनी जबरदस्त लगती है । तो अगर ये फ़िटिंग वाली जींस पहन ले । तो हम लोगों का तो कलेजा ही मुँह को आ जायेगा ।
उसे कई लडकों की तरफ़ से दोस्ती के प्रस्ताव आये । लेकिन उसने स्वीकार नही किये । वो तो बस अपनी नयी बनी कुछ सहेलियों के साथ अपनी पढाई के सिलेबस तक ही मतलब रखती थी । नवीन की नजर भी पूनम पर पङ चुकी थी । पूनम के कद । चेहरे । और पूर्ण विकसित उभारों के सामने उसे कालेज की बाकी लडकियाँ बेहद फ़ीकी लगने लगी ।
नवीन ने अपने स्टायल से पूनम को रिझाने की कोशिश की । लेकिन पूनम ने उसकी तरफ़ देखा तक नहीं । नवीन ने अलग अलग प्रकार से पूनम को रिझाने की कोशिश की । लेकिन उसकी दाल नही गली ।

फ़िर 1 दिन नवीन ने पूनम को उसकी किसी सहेली के साथ कालेज के बगीचे में बैठे चाय पीते हुए देख लिया ।
तब नवीन ने आसपास कम भीड देखते हुए पूनम के पास जाने का फ़ैसला किया । पूनम ने भी दूर से नवीन को आते हुए देख लिया था । नवीन जब बिलकुल पास आ गया । तो पूनम ने भी उसको गौर से देखा ।
तब नवीन हल्का सा मुस्कराते हुए पूनम से बोला - ये जो घडी मैंने पहनी है । ये इम्पोर्टिड है । ये जो मेरे जूते हैं । ये भी इम्पोर्टिड है । मेरे गोगल्स भी इम्पोर्टिड है । मेरा पर्स जिसमें मैं पैसे रखता हूँ । वो भी इम्पोर्टिड है । ये जो मैंने जैकेट पहनी है । ये भी इम्पोर्टिड है । जैकेट के नीचे जो शर्ट पहनी है । वो भी इम्पोर्टिड है ।
ये सब कहते कहते नवीन हल्का हल्का मुस्कराता रहा था । उस समय नवीन के भाव ऐसे थे । जैसे वो उस गाँव की रहने वाली लडकी का मजाक उडा रहा हो ।
तभी यकायक अपनी चुप्पी तोडते हुए पूनम ने कहा - लगता है । तेरा बाप भी इम्पोर्टिड है ।

रविवार, जनवरी 09, 2011

दिस इज द हाईएस्ट साधना । ( पहला भाग )


स्तब्ध महारथी । नामक यह कहानी लेखक श्री जगदीश महान्ति जी द्वारा सत्तर के दशक में लिखी गई थी । और उस समय की चर्चित कहानी है । इस कहानी में मात्र एक योगी शिबानन्द जी की पुस्तक से प्रभावित
होकर एक युवक का जीवन ही बदल जाता है । जीवन में संयम । सहनशीलता । स्वीकारना । और समझौता किस तरह से किया जाय । ये इस कहानी से बेहतर जाना जा सकता है । योग साधना के लिये प्रेरित करती और जीवन में उच्च आदर्श सिखाती एक बेहतरीन कहानी ।...


जिस दिन स्वामी शिवानंद की किताब अरुणाभ के घर आई । उसी दिन दिव्येंदु भी अरुणाभ के घर आया । स्वामी शिवानंद की उस किताब का नाम था । प्रक्टीकल लेसन इन योगा । क्राउन साइज के पेपर बेक संस्करण वाली अंग्रेजी में लिखी गई इस किताब में शिवानंद के जीवन । दर्शन । योग । साधना । समाधि और ईश्वर उपलब्धि के बारे में विस्तृत जानकारी दी गई थी । 
दिव्येंदु जिसकी लंबाई पाँच फुट चार इंच तथा आँखों पर ज्यादा पावर के चश्मे लगाए हुए एक हष्टपुष्ट । काला कलूटा प्राइवेट छात्र जिसे कास्टग की परीक्षा देनी थी । वह प्रेशर कुकर में खुद अपना खाना बनाता था । वह बहुत दुखी रहता था । इस वजह से वह दया का पात्र था । रहन सहन उसका इतना साधारण था कि विश्वास नहीं किया जा सकता था । 
आज के जमाने में भी वह अपने सिर के बालों को बहुत छोटा छोटा कटवाता था । और उन कम बालों में तेल ज्यादा लगाता था । पहनने में वह अपने लिए प्रयोग करता था । चौदह इंच लंबी मोरी की बेलबॉटम पैण्ट । एक संस्था में वह एकाउंट क्लर्क के रुप में कार्यरत था ।
मगर अरुणाभ की तुलना न तो शिवानंद के साथ की जा सकती थी । और ना ही दिव्येंदु के साथ । अरुणाभ एक टेक्निकल एडवाइजर के रुप में काम करता था । वह लंबे लंबे बाल रखता था । तथा एक बोहिमियान की भाँति इधर उधर भटकता रहता था ।
यहाँ तक कि वह अपनी नौकरी की भी परवाह नहीं करता था । और न ही भविष्य के लिए सपने देखता था । वह किसी के घर में पेइंग गेस्ट के रुप में रहता था । भगवान के अस्तित्व के बारे में वह किसी से तर्क वितर्क नहीं करता था । उसके जीवन की सबसे बड़ी बात थी । वह अपने आपको किसी नियम और अनुशासन के ढाँचे में बाँधकर नहीं रखता था । 


मगर वह कहानी कविता लिखने का शौकीन था । अरुणाभ की अपने बारे में एक अजीबोगरीब धारणा थी कि लोग उसे समझ नहीं पा रहे हैं । इसके अलावा उसके व्यक्तित्व में कुछ ऐसी चीजें है । जिसके कारण शुरु शुरु में लोग उसकी ओर आकर्षित होकर खिंचे चले आते हैं । 
लेकिन जैसे ही वे उसके पास आ जाते हैं । वैसे ही स्टैटिक इलेक्ट्रीसिटी के नियमों की भाँति उसके व्यक्तित्व का वह आकर्षण इस तरह शून्य हो जाता है कि सामने वाले वे लोग केवल उससे दूर भाग जाते हैं । वरन कभी कभी जानलेवा शत्रु भी बन जाते हैं । 
इस वजह से अरुणाभ अधिकतम समय अकेले रहना पसंद करता है । अकेलापन उसकी साँसों में हमेशा के लिए बस गया है । तथा वही अकेलापन उसके खून और अस्थिमज्जा में हमेशा हमेशा के लिए घुल गया है । बिना अकेलेपन के क्या वह सहज ढंग से जिंदा रह पाएगा ? 
इस प्रश्न का हल खोजते खोजते वह कहीं खो जाता था । ठीक उसी अनसुलझे प्रश्न की तरह अरुणाभ के पास शिवानंद की किताब और दिव्येंदु दोनों एक साथ आए । इन दोनों को लेकर अरुणाभ दुविधा में पड़ गया था । क्योंकि उन दोनों का उसकी जीवन पद्धति के साथ तालमेल नहीं बैठता था । बचपन से ही योग साधना में अरुणाभ की कोई रुचि नहीं थी । मगर अभी योग साधना करने वाले अपने एक दोस्त का सानिध्य पाकर उसका इस तरफ झुकाव हो गया था । उसके मन में एक आकांक्षा पनपी थी । भले उसे ईश्वर प्राप्ति नहीं हो । मगर सार्वभौमिक सत्ता का लेशमात्र अनुभव भी उसके जीवन को सार्थक बना देगा । 
जीवन के उसी संक्रमण काल में दिव्येंदु उसके पास आकर कहने लगा था । उसे कॉस्टग का इम्तिहान देना है । उसे कहीं पर एक अच्छा घर नहीं मिल पा रहा है । इधर कंपनी भी उसे क्वार्टर नहीं दे रही है । अगर उसे कोई आपत्ति नहीं हो तो वह उसके साथ रहेगा । अरुणाभ के लिए यह बड़ी दुबिधा की घड़ी थी । क्योंकि वह जानता था कि उसका किसी के साथ एडजस्ट होकर चलना बहुत मुश्किल है । इतना होने के बावजूद भी वह दिव्येंदु को उसके मुँह पर मना नहीं कर पाया ।
अगले दिन उसने बाजार से शिवानंद की किताब खरीदी । उसी दिन दिव्येंदु अपने टेबल । खाट । बिछौने । बेडिंग । बक्से । रसोई के सामान । किताबें । कॉपियों सहित पहुँच गया था । अरुणाभ के घर । एक तरफ शिवानंद की किताब अरुणाभ के मन पर अपना अधिकार जमाने लगी थी । दूसरी तरफ दिव्येंदु अरुणाभ के घर पर अपना अधिकार जमाने लगा था ।
अरुणाभ का क्वार्टर एक फ्लैट के ऊपर वाली छत पर स्थित था । वह फ्लैट राऊरकेला शहर के मध्मवर्गीय परिवारों के लिए आकर्षण का एक केन्द्र था । उसके क्वार्टर में दो कमरे थे । अगर एक कमरे को बेडरुम तथा दूसरे को ड्राइंग रुम कहने से कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी । 
इन दो कमरों के बीच एक खाली जगह थी । वह जगह डायनिंग हॉल के काम में आती थी । मगर उस जगह में केवल एक डायनिंग टेबल ही रखा जा सकता था । इसके अलावा इस क्वार्टर में लेट्रिन । बाथरुम । किचन आदि की सुबिधा थी । वहाँ के लोग इस तरह के क्वार्टर को वनबीआर ( वन बेडरुम ) टाइप का क्वार्टर कहते थे ।
दिव्येंदु ने आते ही पहले बेडरुम से अरुणाभ की खटिया को बाहर निकालकर ड्राइंग रुम में रख दिया । और अपनी खटिया को बेडरुम में बिछा दिया । इस खटिया के पास एक सेंट्रल टेबल और दो कुर्सी लगा देने के बाद और एक खटिया रखने की जगह नहीं बच पा रही थी । फिर दिव्येन्दू ने आदेश देने के लहजे में अरुणाभ से कहा । ड्राइंग रुम में उसको सोने में कोई परेशानी तो नहीं है ?
उसकी बात सुनकर अरुणाभ के दिल को ठेस जरुर लगी । मगर उसका स्वभाव इस तरह का था कि वह मुँह खोलकर किसी का विरोध नहीं कर पाता था । इस कारण वह दिव्येंदु को भी कुछ नहीं बोल पाया । अरुणाभ की किताबें । कहानियों की पांडुलिपि । पत्र पत्रिकाओं से भरे रेक को एक कोने में खिसकाकर उसने अपने कोर्स की किताबों को उस जगह पर सजा दिया । 
बेडरुम की दीवार पर लटक रहे अरुणाभ के कपड़ों को उतारकर उसने ड्राइंगरुम की दीवार पर टंगे एक हैंगर पर लटका दिया । तभी अरुणाभ के मुँह से चूं तक नहीं निकली । वह अच्छी तरह समझ गया था कि आज के बाद उसको उसके ही घर में एक शरणार्थी की तरह रहना पड़ेगा ।
ड्राइंगरूम में पहले ही दिन से अरुणाभ को कई कष्टों का सामना करना पड़ा । दिन रात वहाँ मच्छरों की भरमार तथा तेज गर्मी से वह असुलाने लगा । सीलिंग फैन तो केवल बेडरुम में ही लगा हुआ था । ड्राइंग रुम में मच्छरदानी लगाने से गर्मी लगने लगती थी । और अगर मच्छरदानी नहीं लगाई जाए तो मच्छर काट काटकर हालत खराब कर देते थे । उसकी यह दशा देखकर दिव्येंदु ने अरुणाभ को बेडरुम में सो जाने के लिए कहा था । उसके लिए उसने अपने टेबल चेयर एक तरफ खिसकाकर फर्श पर दरी बिछा दी थी । मगर वहाँ सोने के लिए अरुणाभ ने इंकार कर दिया था । 
क्योंकि उसका मन इस बात के लिए गवाही नहीं दे रहा था कि दिव्येन्दु खाट के ऊपर सोएगा । और वह घर का मालिक होकर भी नीचे फर्श पर बिछी हुई उस दरी पर जिसके पास दिव्येंदु की चप्पलें रखी गई होगी । उसका यह व्यवहार तो उसे ऐसे लग रहा था मानो वह उसके घर का एक नौकर हो । उसे यह सब बेहद अपमानजनक लग रहा था । मगर दिव्येंदु ने इन सब बातों को इस तरह बेफिक्र होकर कहा था । जैसे उसके इस प्रस्ताव से अरुणाभ को दुखी होने का कोई सवाल ही नहीं उठता है ।
उस दिन दुखी होकर अरुणाभ अपनी खटिया । बिछौने । मच्छरदानी समेत शिवानंद की किताब को लेकर छत के ऊपर सोने के लिए चला गया । सोने से पूर्व कुछ न कुछ पढ़ने की आदत थी उसकी । छत पर अंधेरा होने की वजह से जबरदस्ती वह सोने की चेष्टा करने लगा । मगर उसे नींद नहीं आ रही थी । तब नीचे जाकर उसने एक मोमबत्ती जलाई और उसे जलाकर खाट के पैर के ऊपर सावधानी से रखा । 
फिर मच्छरदानी के भीतर घुसकर ध्यानपूर्वक शिवानंद की किताब पढ़ने लगा । मगर बीच बीच में उसका ध्यान दिव्येंदु द्वारा किए जा रहे दुर्व्यवहार की तरफ चला जाता था । यह सोचकर उसका मन दुखी हो रहा था । इसी दौरान उसकी नजर शिवानंद की एक कविता के ऊपर पड़ी । कविता की पहली पंक्ति इस प्रकार थी ।
एडॉप्ट । एडजस्ट । एकमोडेट । बीयर इन्सल्ट । बीयर इन्जूरी । दिस इज द हाईएस्ट साधना ।
शिवानंद जी की इन पंक्तियों को पढ़कर अरुणाभ इस तरह प्रभावित हो गया था कि वह केवल इन्हीं पंक्तियों को बारम्बार दोहरा रहा था । यहाँ तक साधना को करने के लिए मानसिक रुप से तैयार भी हो गया था ।
भले कुछ हो या न हो । 
शिवानंद की किताब अरुणाभ के जीवन में एक अनुशासन को ले आई । तथा दिव्येंदु के आने ने घर की स्वच्छता को एक नया मोड़ प्रदान किया । कभी अरुणाभ के स्वभाव में अनुशासन का नामोनिशान नहीं था । ना ही खाने में । ना ही नहाने में और ना ही कहानी लिखने में । कभी कभी तो ऐसा भी होता था कि वह अपने बिछौने तक नहीं समेटता था । और यहाँ तक कि घर में झाडू लगाने जैसे रोजमर्रा के काम करना या तो वह भूल जाता था । या फिर उनकी अनदेखी कर देता था । 
वहीं अरुणाभ आजकल पूरी तरह बदल गया था । आजकल वह सुबह चार बजे उठने लगा था । शिवानंद की किताब में जैसे जैसे निर्देश दिए गए थे । ठीक वैसे ही उनके अनुकरण करता था । यहाँ तक बिना दंतमंजन किए तथा बिना स्नान किए एकाग्रता के लिए ध्यान की मुद्रा में बैट जाता था । केवल मुँह धोकर ही । मगर ध्यानावस्था में उसका बेलगाम मन इधर उधर भटकता था । 
छुट्टी होने पर स्कूल से लौटते हुए बच्चे की तरह । अरुणाभ यह कहकर अपने मन को सांत्वना देता था । कभी न कभी वह दिन जरुर आएगा । जब उसका मन स्थिर हो जाएगा । तथा ध्यान लगने लगेगा । यही सोचकर वह अपनी कोशिश जारी रखता था ।
दिव्येंदु के आने से उनका घर एक आदर्श घर की भाँति तरोताजा लगने लगा था । 
पहले की तरह अभी उसे अपने घर में बिखरी हुई किताबें तथा फर्श पर इधर उधर गिरे सिगरेट के टुकड़े देखने को नहीं मिल रहे थे । छत के कोनों पर मकड़ी के जाले भी नजर नहीं आ रहे थे । तथा पंखे की पंखुडियाँ भी साफ साफ दिखने लगी थी । आजकल घर में दो बार झाडू लगाया जाता था । इतना कुछ होने के बाद भी अरुणाभ को ऐसा लग रहा था । जैसे वह भीतर से टूट गया हो । और उसका ये घर अब उसका नहीं रहा हो । वह अब एक शरणार्थी की भाँति जिंदगी जीने लगा है । 
जिसका मुख्य कारण था शिवानंद की वह कविता । अरुणाभ मन ही मन उस कविता को दोहराता रहता था । एडॉप्ट । एडजस्ट । अकमोडेट । बीयर इन्सल्ट । बीयर अन्जूरी । दिस इज द हाईएस्ट साधना । जिस दिन से उसने कविता पढ़ी थी । उसी दिन से अरुणाभ दिव्येंदु के साथ एडजस्ट करने की कोशिश कर रहा था । इसी वजह से उसने आज तक दिव्येंदु के स्वार्थी स्वभाव के खिलाफ अपना मुँह नहीं खोला । उस दिन से ही वह सोने लगा । रात को कभी छत के ऊपर । कभी ड्राइंग रुम के अंदर गर्मी के भीतर । वह सारे कष्टों को इस तरह सहन किए जा रहा था । मानो वे कष्ट उसके लिए बिल्कुल असहय नहीं रहे ।
अरुणाभ अपनी पढ़ाई लिखाई के लिए दिव्येंदु के टेबल का उपयोग करता था । एक तरफ दिव्येंदु बैठता था । तो दूसरी तरफ वह स्वयं । दिव्येंदु की आदत थी । रात को ग्यारह बजे तक पढ़ने की । उसके बाद वह कमरे की लॉइट बंद करके सो जाता था । क्योंकि उसे अंधेरे में सोना पसंद था । जबकि अरुणाभ की कोई नियत समय सारणी नहीं थी । वह कभी रात को आठ बजे सो जाता था । तो कभी पूरी रात कहानी लिखता रहता था ।
एक दिन की बात है । रात के ग्यारह बज रहे थे । टेबल पर बैठकर दोनो पढाई कर रहे थे । दिव्येंदु के सोने का समय हो गया था । जबकि अरुणाभ कहानी लिखने में व्यस्त था । जब दिव्येंदु से रहा नहीं गया । तो उसने कमरे की लाइट बुझा दी । तथा अपने बिस्तर पर सोने चला गया । यह कहते हुए । अरुणाभ । मुझे जोरो से नींद आ रही है । तुम दूसरे कमरे में जाकर अपनी कहानी लिखो ।.. कृमशः ( कहानी का दूसरा भाग इसी के साथ प्रकाशित है । ब्लाग की साइड पर देखें । )

दिस इज द हाईएस्ट साधना । ( अंतिम भाग



दिव्येंदु ने विनीत भाव से अरुणाभ से यह बात कही । क्योंकि अरुणाभ से आँखे मिलाने की उसकी हिम्मत नहीं हो रही थी । 
जबकि अरुणाभ का व्यक्तित्व इस तरह बदल गया था । उसने आवेग में आकर न तो दिव्येंदु से कुछ कहा और न ही स्विच ऑन किया । 
वह तो यह भी नहीं कह पाया । देखो  यह अरुणाभ का घर है । यहां अरुणाभ का हुक्म चलेगा । जब तक उसकी मर्जी होगी । तब वह यहाँ बैठकर पढ़ेगा ।
मगर अरुणाभ के मुँह से एक भी शब्द नहीं निकला । भीतर ही भीतर दिव्येंदु के इस तरह के व्यवहार से वह अपने आपको बहुत दुखी तथा अपमानित अनुभव कर रहा था । 
तब भी अपने क्रोध पर नियंत्रण करके एक अपराधी की तरह अपने कागज पत्र उठाकर ड्राइंग रुम की खटिया पर जाकर अपनी कहानी लिखना शुरु कर दिया । मगर आंतरिक अंतर्द्वंद्व ने उसको अस्थिर कर दिया था । तुरंत वह छत के ऊपर जाकर टहलने लगा । मन ही मन दिव्येंदु के विरुद्ध युद्ध की घोषणा का संकल्प लेते हुए आकाश की तरफ देखने लगा । लेकिन जब वह अपने कमरे में लौटा तो उसने देखा दिव्येंदु सो चुका था ।
अरुणाभ के योग साधना के अभ्यास के बारे में  दिव्येंदु जान चुका था । जब कभी भी अरुणाभ ध्यानावस्था में बैठने का प्रयास करता था । तब  दिव्येंदु जान बूझकर उसके पास जाने लगता था । उसके पैरों की आवाज सुनकर अरुणाभ की साधना भंग हो जाती थी । शायद दिव्येंदु को ऐसा लगता होगा कि योग साधना बच्चों का खेल हो । दिव्येंदु की उपस्थिति उसकी साधना में बारबार खलल पैदा कर रही थी । फिर अपने आप पर नियंत्रण कर उसने दिव्येंदु को कुछ नहीं बोला । 
ठीक ऐसे समय पर शिवानंद की किताब की वे बातें उसे याद आने लगती थी । योग साधना के लिए एक एकांत कमरा होना चाहिए । हमेशा खिड़की दरवाजे बंद होने चाहिए । कमरे के अंदर अपने इष्टदेव का एक फोटो या कोई प्रतिमा । ईसामसीह का चित्र । मदर मेरी का चित्र या काबा की मस्जिद का चित्र अवश्य होना चाहिए । जहाँ कमरे के भीतर योगाभ्यास के लिए एक कंबल बिछा देना चाहिए । घर के सारे कमरों में सुवासित अगरबत्तियाँ अवश्य जलानी चाहिए । 
इस बात पर भी ध्यान देना चाहिए कि कमरे के भीतर आलतू  फालतू सामान नहीं रखा जाए । वास्तव में ऐसा होना चाहिए कि जैसे ही हम कमरे के भीतर प्रवेश करे । वैसे ही वहाँ का शुद्ध वातावरण आपको अपनी तरफ आकर्षित कर ले । अगर किसी कारणवश आपको अलग से पूरा कमरा नहीं मिलता है । तो कोई बात नहीं । आप कमरे के किसी कोने में कपड़े से घेरकर एक छोटी सी जगह में अपने लिए उपासना गृह बना सकते हो ।


किताब की ये सारी बातें याद आते ही अरुणाभ का मन ग्लानि से भर गया । अगर दिव्येंदु उसके घर में नहीं रह रहा होता । तो शायद दिव्येंदु के कमरे को अपनी उपासना के लिए अलग से रख लेता । अब यह कमरा इस कार्य के लिए मिलना मुश्किल है । उसको बारबार ऐसा लगने लगा । मानो दिव्येंदु उसके ऊपर बोझ बनकर बैठा हुआ हो । तथा उसकी सारी इच्छाओं की चाबी उसने ले ली हो ।
बात यहाँ तक होती । तब भी कोई बड़ी बात नहीं थी । मगर दिव्येंदु ने बातों बातों में एक दिन उसकी योग साधना पर करारा व्यंग कस दिया । उसके उत्तर में अरुणाभ ने उसको प्राणायाम से लेकर ध्यान । धारणा और समाधि तक के सारे विषयों पर पर्याप्त प्रकाश डाला । उसके इस दर्शन का उपहास उड़ाते हुए दिव्येंदु ने उसका नया नामकरण कर दिया । मिस्टर शिवानंद ।
उसके अगले दिन प्रभात की शुभवेला में । अरुणाभ पदमासन लगाकर अपनी दोनो भृकुटियों के मध्य मन को स्थिर कर एकाग्रता की चरम अवस्था प्राप्त करने के लिए महाप्रभु जगन्नाथ के निराकार स्वरुप का ध्यान करने लगा । तभी उसका मन इधर उधर भटकने लगा । उसको लगने लगा । जैसे कोई उसके कान में जोर जोर से दिव्येंदु की नकल करते हुए चिल्लाकर बुला रहा हो । मि शिवानंद । मि शिवानंद ।
कानों के परदों से टकराकर इस आवाज की प्रतिध्वनि फैलती जा रही थी । मस्तिष्क से लेकर चेतना के उच्चतम स्तर तक ।
एकाएक अरुणाभ का ध्यान भंग हो गया । वह उठकर खड़ा हो गया । शिवानंद की किताब फिर उससे कहने लगी । उसने केवल तुम्हारे शरीर । मन और अहंकार का अपमान किया है । मगर तुम तो इन तीनों चीजों से ऊपर हो । तुम यथार्थ में वह नहीं हो । जिसे तुम समझ रहे हो  । उसने तुम्हारे असली स्वरुप का अपमान नहीं किया है । क्योंकि तुम्हारे असली स्वरुप में तो वह खुद भी शामिल है । सही शब्दों में उसने तुम्हारी चेतना के निम्न धरातल पर छिपे अहंकार का अपमान करके तुम्हारी सहायता की है । ताकि तुम अहंकार शून्य होकर अपनी योग साधना के मार्ग में तेजी से आगे बढ़ सको ।
शिवानंद की किताब से मिले मार्गदर्शन पर बहुत देर तक मन ही मन विचार विमर्श करने के बाद अरुणाभ इस निष्कर्ष पर पहुँचा कि आगे से वह ज्यादा से ज्यादा चुपचाप रहने की कोशिश करेगा । तथा दिव्येंदु के साथ कम से कम बातचीत करेगा ।
शिवानंद की किताब और आगे मार्गदर्शन करते हुए निर्देश देने लगी । लौकिक जगत को मिथ्या समझकर ही मनुष्य अपनी चेतना शक्ति का विस्तार कर सकता है । भूख और प्यास तुम्हारे शरीर और मन पर अपना आधिपत्य जमाकर रखती है । जब तुम अपनी प्रकृति । इच्छाशक्ति और अनुभूतियों के ऊपर नियंत्रण रखने की क्षमता में वृद्धि करोगे । तब तुम देखोगे । तुम्हारे भीतर एक अभूतपूर्व मानसिक शक्ति का विकास हो रहा है । और यह मानसिक शक्ति ही तुम्हारी साधना के लिए साध्य का काम करती है ।
शिवानंद की किताब का अनुकरण करते हुए जहाँ अरुणाभ ने अपनी खटिया के ऊपर केवल दरी को छोड़कर सारे बिछौने चद्दरों की पोटली बाँधकर खटिया के नीचे पटक दिया । वहाँ दिव्येंदु उसी दिन अपने सोने के लिए एक नरम सा गद्दा खरीदकर ले आया । तथा आधे घंटे तक उसकी तारीफ के पुल बाँधने लगा । जब दिव्येंदु घर की सफाई कर रहा था । तथा अरुणाभ की खटिया के नीचे मिली उस पोटली को उठाकर अपने बेडरुम के वेन्टीलेटर के पास दीवार में बनी अलमारी में पटक दिया ।
पोटली को इस तरह पटकना महज सामान्य बात हो सकती है । मगर अरुणाभ को लगा कि दिव्येंदु ने घृणा तथा अवहेलना के साथ एक बड़ा सा पत्थर उसके नीचे फेंक दिया हो । केवल दरी बिछाई हुई खाट के ऊपर सोते सोते अरुणाभ सोचने लगा । क्या दिव्येंदु के ऐसे व्यवहार के लिए प्रतिक्रिया व्यक्त करना उसके लिए उचित होगा ? क्यों नहीं होगा उचित ? निश्चित तौर पर उसे दिव्येन्दु के व्यवहार पर अपनी प्रतिक्रियाएँ व्यक्त करनी चाहिए । नहीं । नहीं । उसका क्रोध करना उचित नहीं है । कम से कम साधना पथ पर अग्रसर होने के लिए तो उचित नहीं है ।
ऐसे ही अन्तर्द्वन्द तथा दुविधा के बीच झूलते हुए वह शिवानंद की किताब पलटने लगा । उसके मस्तिष्क में शिवानंद की वह कविता घूमने लगी । एडॉप्ट । एडजस्ट । एकमोटेड । बीयर इनसल्ट । बीयर इन्जुरी । दिस इज द हाईएस्ट साधना ।
मगर ऐसी बहुत सारी छोटी मोटी घटनाएँ थी । जो अरुणाभ को बीच बीच में विचलित कर देती थी । जैसे दिव्येंदु का चिल्ला चिल्लाकर जोरजोर से पढ़ना । अरुणाभ के कहानी लिखने के समय में रेडियो चलाकर हिंदी फिल्मों के गीत सुनना । अपनी बड़ी बड़ी डींगें हाँकना कि उसने भी अपने बचपन में अच्छी अच्छी कहानियों की रचना की है इत्यादि । अरुणाभ के सारे हैंगरों पर दिव्येंदु ने अपने शर्ट पैण्ट टाँग दिए थे । इसलिए बाध्य होकर अरुणाभ को अपने कपड़े रस्सी के ऊपर लटकाने पड़ रहे थे । अरुणाभ के साबुन केस में दिव्येंदु अपना साबुन रख देता था । इसलिए अपना साबुन कागज में लपेटकर रखने के लिए अरुणाभ मजबूर हो जाता था । 
रात को ग्यारह बजे इधर उधर घूम फिरकर जब अरुणाभ घर लौटता था । तब नींद से उठकर दरवाजा खोलते समय दिव्येंदु उलटा पुलटा बोलने लगता था । इन सभी बातों को लेकर अरुणाभ का मन बुरी तरह से आहत हुआ था । हर समय शिवानंद की किताब उसे उपदेश देती थी  । अहंकार शून्य होने के लिए । स्वार्थ रहित होने के लिए तथा सारे सांसारिक सुख दुख से ऊपर उठकर स्थितप्रज्ञ हो जाने के लिए ।
एक बार जरुर शिवानंद की किताब के उपदेश अरुणाभ के ऊपर प्रभाव नहीं डाल सके । जब वह सायं भ्रमण करके रात को ग्यारह बजे घर लौटा । उसने देखा उसके घर के बाहर एक बड़ा सा ताला लगा हुआ था । ताला लगाकर दिव्येंदु कहीं बाहर गया हुआ था ।
अपने ताले की चाबी अरुणाभ दिव्येंदु को पहले से दे चुका था । मगर इस आधी रात को दूसरा ताला लगाकर दिव्येंदु किस तरह खुशी से बाहर चला गया ? सीढ़ी गिनते गिनते अरुणाभ नीचे उतर गया । तथा बाहर रास्ते पर चहलकदमी करते करते उसका इंतजार करने लगा । मगर दिव्येंदु का कोई ठिकाना नहीं था । इधर उधर चक्कर काटते काटते अरुणाभ बुरी तरह से हताश हो गया था । और दिव्येंदु के ऊपर उसका क्रोध बढ़ता ही जा रहा था । मन ही मन उसे कोसने लगा । 
इस बार उसने मन में निश्चय कर लिया कि जैसे दिव्येंदु घर लौटेगा । वह उसे स्पष्ट तौर पर घर खाली करने के लिए कह देगा । लेकिन अभी तक दिव्येंदु का कोई अता पता नहीं था । अंत में थक हारकर उसने अपने पडोसी नायर बाबू के घर का दरवाजा खटखटाया तथा आधी रात में उन्हें नींद से जगाकर । उनके घर के भीतर से होते हुए छत पर जाने की अनुमति माँगी । 
क्योंकि अरुणाभ के छत पर जाने के लिए सिर्फ दो ही रास्ते थे । एक अपने घर के अंदर से होकर । तथा दूसरा उसके पडोसी नायर के घर के अंदर से होकर ।
अपने पडोसी नायर की दया से भले ही वह अपनी छत के ऊपर जा पाया । मगर वहाँ भी कितनी देर वह दिव्येंदु का इंतजार करता ? शर्ट खोलकर बिना दरी के छत पर सो गया । इधर उधर की सोचते हुए दिव्येंदु को मन ही मन खूब कोसने लगा । यहाँ तक भगवान से उसके मर जाने की प्रार्थना करने लगा । 
रात भर आसमान में वह तारे गिनता रहा । मच्छरों के दंश से दुखी होकर इधर उधर लोटता रहा । थक हार कब वह सो गया । उसे पता ही नहीं चला । सुबह उठते ही गुस्से से आगबबूला होकर वह दिव्येंदु के पास गया । इससे पहले कि वह उसे डाँटता फटकारता ।  दिव्येंदु से दूसरा ताला लगाकर जाने का कारण जानना चाहा । तब दिव्येंदु ने निर्विकार भाव से उत्तर दिया कि उसे एक जरुरी काम से स्टेशन जाना था । और हड़बड़ी में उसे वह पुराने वाला ताला नहीं मिला । इसलिए उसने दूसरा ताला लगा दिया ।
दिव्येंदु का यह उत्तर सुनकर अरुणाभ ना तो उसको डाँट पाया । ना ही क्वार्टर छोड़कर जाने के लिए कह पाया । और ना ही उसका सामान बाहर फेंक पाया । उसके मुँह से बिलकुल भी आवाज नहीं निकली । वह पूरी तरह से निस्तब्ध था । केवल शिवानंद की कविता की स्वतः मन ही मन आवृत्ति होने लगी । अडॉप्ट । एडजस्ट । एकमोडेट ।
इसी तरह एक दिन और वह रात को ग्यारह बजे के आसपास घर लौटा । दरवाजा खटखटाने के काफी देर बाद दिव्येंदु ने चिटकनी खोली । जैसे ही वह ड्राइंगरुम में घुसा । दिव्येंदु उसके कान में फुसफुसाकर कहने लगा । अरुणाभ । मेरी एक गर्लफ्रेण्ड आई हुई है । आज रात वह इस घर में रहेगी । प्लीज । आज एक दिन और तू छत पर सो जा । बस एक दिन एडजस्टमेंट की बात है ।
गर्लफ्रेण्ड ? या कालगर्ल ? इस छोटे से राउरकेला जैसे शहर में ऐसी भी कोई गर्लफ्रेण्ड हो सकती है क्या । जो किसी जवान लड़के के साथ रात बिताएगी ? दिव्येंदु के बेडरुम का दरवाजा बंद था । कमरे में अँधेरा था । केवल पंखा चलने की आवाज सुनाई पड़ रही थी । ऐसी स्थिति में अरुणाभ को कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था । अपने कपड़े बदलने के बाद हाथ मुँह धोकर बिना कुछ कहे अपना सोने का सामान लेकर वह छत के ऊपर चला गया । जैसे ही वह छत के ऊपर पहुँचा । दरवाजा बंद होने के साथ साथ चिटकनी लगने की आवाज आई ।
दिव्येंदु के द्वारा इस तरह दरवाजा बंद करने की आवाज से वह गुस्से से जल भुनने लगा । अभी उसे क्या करना चाहिए ? फ्लैट में रहने वाले सभी लोगों को बुलाकर क्या उसे यह बता देना चाहिए कि दिव्येंदु एक चालू लड़की को इस क्वार्टर में लेकर आया है ?
पहले पहले तो वह यही करना चाहता था । मगर बाद में उसने अपने आपको यह करने से रोक लिया । छत के ऊपर मच्छरदानी लगाकर खाट के ऊपर दरी बिछाकर एक असहाय की भाँति अरुणाभ सो गया । वह क्वार्टर उसका अपना है । मगर वह शरणार्थी की जिंदगी जी रहा है ।
एक चालू लड़की के साथ दिव्येंदु कितने आराम से बेडरुम के अंदर सो रहा है । और कितने दिनों तक वह सहता रहेगा । अपने अपमान और अवहेलना की धूल को ? और कितने दिन ? नहीं । बहुत हो चुका । अब उसे विरोध करना ही पडेगा । वह कायर पुरुष नहीं है । जो दिव्येंदु द्वारा किए जाने वाले हर तरह के अत्याचार को सहन करेगा । वह भी एक इंसान है । उसकी भी कुछ अपनी व्यक्तिगत चीजें हैं । जिस पर उसका अपना अधिकार है । वह अपने इस अधिकार को क्यों तिलांजलि देगा ?
नहीं । इस बार वह दरवाजा खटखटाकर दिव्येंदु को बाहर बुलाएगा । तथा उस चालू लड़की के साथ घर के बाहर निकाल देगा । यह कहते हुए । जानते हो । मैं इस घर का मालिक हूँ । समझे या नहीं ? तुम पर दया कर बिना भाड़े यहाँ रहने की मैने अनुमति दी । इसका मतलब यह तो नहीं है कि..?
गुस्से से तमतमाकर अरुणाभ उठकर खड़ा हो गया था । वह दरवाजे की तरफ बढ़ने लगा था । जैसे ही वह दरवाजा खटखटाने वाला ही था । तभी उसे लगा कि अचानक किसी ने उसके पाँव पकड़ लिए हो । वह शक्तिहीन हो गया । हाथ उठाकर दरवाजा खटखटाने की भी ताकत नहीं बची थी । 
उसे लग रहा था । उसके तलवे पिघलते जा रहे हो । एक ठंडेपन की सिहरन उठती जा रही थी । तलवों से घुटनों की ओर । शिवानंद की किताब ड्राइंगरूम के भीतर रह गई थी । वरना उससे कुछ उपदेश । कुछ सान्तवना जरुर मिलती । या किताब से कुछ उपाय पता चल जाता । वह बहुत मुश्किल से कुछ बोलने की चेष्टा करने लगा । शिवानंद । मैं क्या करुँ । शिवानंद ? मगर अरुणाभ के मुँह से एक भी शब्द नहीं निकल पा रहा था । अरुणाभ पत्थर की मूर्ति की तरह ज्यों का त्यों खड़ा था । उसे बहुत कष्ट हो रहा था । उसके दोनों पाँव बर्फ की भाँति पिघलते जा रहे थे ।..( समाप्त । 
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