शुक्रवार, जुलाई 16, 2010

इंटरनेट के असामाजिक तत्व

1995 to 2003 may तक । जब तक मैंने इंटरनेट का यूज किया । संभवतः इंटरनेट पर हिन्दी का पदार्पण आज की तरह नहीं था । 
इसके बाद सात सालों के लिये में इंटरनेट ही नहीं इस प्रथ्वीलोक से ही बाहर चला गया ।
पिछले एक साल से जब मत्युलोक में ड्यूटी देने वापस आया । और अभी तीन महीने पहले ही होली से छह दिन पहले एक लेपटाप विथ नेट कनेक्टिविटी पर्चेज किया ।
तो उन दिनों की तुलना में इंटरनेट पर हिन्दी की धूम ( कह सकते हैं न ) दिखायी दी । एक सुकून सा महसूस हुआ । हांलाकि अंग्रेजी मेरे लिये कभी हउआ नहीं थी । पर हिन्दी को देखने में एक अलग ही आनन्द आया ।
पहले जमकर सर्फ़िंग की । उस दौर के दोस्त आदि तलाशने चाहे । पर इस अंतराल में वे अतीत का हिस्सा बनकर रह गये । या कहना चाहिये इस बीच इंटरनेट में क्रान्तिकारी बदलाब हो चुका था ।
खैर ब्लागिंग की आंधी चल ही रही थी (या है ) । सो ब्लाग बना डाले । मुफ़्त का कुछ भी मिले अच्छा ही लगता है । सौ ब्लाग ( क्योंकि मुफ़्त हैं  ) बनाना चाहता था । फ़िर सोचा गूगल तो मुझे झेल लेगा । पर सौ ब्लाग में खुद ही नहीं झेल पाऊँगा..?
खैर साब मुख्य बात पर आता हूँ । गूगल सर्च के लिये कमांड दी । फ़िर हिन्दी को हिट किया । इसके बाद गूगल की नाली में k kh b bh d dh c ck a as...etc..इस तरह की की टायप करता और देखता कि गूगल ने इससे रिलेटिव क्या क्या मैटर स्टाक कर रखा है ? 
अब कुछ उदाहरण देखें b से ब्रा ब्लाउज बहन...ये ज्यादा निकले । p से पेटीकोट..पकङ लिया..पकङ कर..आदि..g का मामला बेहद संवेदनशील था..घुसेङा..घुसेङ दिया...घुसेङ कर आदि.. अधिक उदाहरण देना असभ्यता और अश्लीलता की सीमा तोङ सकते हैं ।

मुझे इन इंटरनेटी असामाजिक तत्वों की तुलना में वे शोहदे भाई काफ़ी शरीफ़ नजर आये जो सङक आदि की दीवालों पर शिश्न या योनि के पर्यायवाची लिखकर हमारे शब्द ग्यान की यौन शब्दाबली में प्रायः दुर्लभ इजाफ़ा करते हैं ।
क्योंकि इनके लिखे शव्द प्राय शब्दकोषों में नजर नहीं आते ? मैं अक्सर यही सोचता हूँ कि बहु प्रचलित ये शब्द विद्वानों की निगाह में क्यों नहीं आये ?
खैर साहब आप यकीन करें । अगर किसी रास्ते पर इस तरह के वाक्य लिखे हों तो क्या आप निकलना बन्द कर देंगे ? नहीं ना । सो उन्हें अनदेखा करते हुये । शब्दों का सफ़र । विनय पत्रिका । उडनतश्तरी । गठरी । जो ना कह सके । रवि रतलामी । सभी ब्लाग एग्रीगेटर जैसे बङिया बङिया नामों को छांटा और कमांड दे दी ।
ये एकदम सच बात है जब मुझे बेहद शरमिंदा होना पङा । मेरे पास कुछ प्रतिष्ठित लोग और कुछ आदरणीय पारवारिक लोग बैठे थे । जब गूगल ने कमांड के अनुसार सर्च पिटारा खोला ।
तो उसके एक पन्ने के लगभग तीस परिणामों में बीस पर ( हा हा हा हा ) अवर्णनीय । अविश्वसनीय । अकल्पित । अंचम्भित । स्तंभित कर देने वाला मैटर प्रकट हुआ । ऐसी तैसी मारूँ इस कम्पूटर और इंटरनेट की । या शायद हङबङाहट में पेज तेजी से बन्द करने की वजह से डबल कमांड या अन्य कोई any रीजन... पेज बन्द नहीं हुआ । तब सीधे सीधे कम्प्यूटर आफ़ ही कर दिया । सबने देख लिया । पर अनदेखा करने के अतिरिक्त और कर ही क्या सकते थे ।
खैर साहब । जिग्यासा जगा गया वो पेज । और जैसे ही मौका मिला । फ़िर से खोला । अबके अकेले मैं । तो क्या पाया a to z..ज्यादातर हिन्दी के हर प्रष्ठ पर यह भाई लोग पूर्ण बहुमत से मौजूद है । और इनके बीच में साधु संत के स्वभाव वाले बोधिसत्व । अजीत । रवि ( रतलामी ) तथा अन्य मान्य विभूतियां जैसे निराला । तुलसी । कबीर..या कोई भी क्यों न हो ये कुकरमुत्ते हर जगह उपस्थिति थे । और शरीफ़ लोग इनके बीच ऐसे फ़ंसे हुये थे । जैसे लंका में विभीषण या फ़िर दांतों में जीभ ।
फ़िर सोचा एक बार (जिग्यासा तो जिग्यासा ही है ) इनके भी सद( या बद ) साहित्य का अवलोकन कर ही लिया जाय । तो पता नहीं.. ये कौन से ग्रह के प्राणी थे ? जो अपनी .बहन ..माँ..चाची..वुआ..शिक्षिका कोई भी क्यों न हो बूढा मरे या जवान मोहे हत्या से काम..चरितार्थ करते हुये सबसे संभोग करते हैं ?
 और कथावस्तु पर यकीन करें तो इनके परिवार के सभी प्राणी ऐसे ही है । जैसा पशुओं में होता है । अब ये पता नहीं सच है या झूठ ? इनमें महिला लेखिकाओं की भी संख्या बहुत अधिक है ।
अहो धन्य हो देवी..स्व अनुभव के कामदृश्यों का ऐसा प्रभावी वर्णन ? ये गीत गजल लिखने वाले ब्लागर भले ही हिन्दी का कोई उत्थान न कर पायें ? पर आप कामीजन निसंदेह हिन्दी का उत्थान कर रहें हैं । आने वाली पीढी को मुफ़्त कामोलोजी आपके सराहनीय प्रयास से प्राप्त होगी । और अन्य भाषा भाषी आपके मधुर मनोहर साहित्य का रसपान करना चाहेंगे तो क्यों नहीं हिन्दी की ओर उन्मुख होंगे ।
हिन्दी के प्रचार प्रसार में आपकी अविस्मरणीय भूमिका सदैव सुनहरी अक्षरों में अंकित रहेगी ? 
धन्यवाद .नमन..और उतना ही अच्छा है जितनी जल्दी हो आपके दर से गमन..।

3 टिप्‍पणियां:

राकेश कौशिक ने कहा…

"रसभरी कविताएं..कहानिंयाँ

जीवन के खट्टे मीठे रस से ओत प्रोत । सुख दुख को । धूप छाँव को सुनाती । गुनगुनाती । कुछ रचनायें ।"

?????????

अजय कुमार ने कहा…

बहुत जायज चिंता है ,मेरा बेटा जब इंटरनेट खोलता है तो हमें बीच बीच में झांकना पड़ता है ,पता नहीं कौन सा पेज खुल जाय और उसकी बाल-बुद्धी पर----

संगीता पुरी ने कहा…

इस नए ब्‍लॉग के साथ आपका हिंदी चिट्ठाजगत में स्‍वागत है .. नियमित लेखन के लिए शुभकामनाएं !!

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