रविवार, जनवरी 09, 2011

दिस इज द हाईएस्ट साधना । ( पहला भाग )


स्तब्ध महारथी । नामक यह कहानी लेखक श्री जगदीश महान्ति जी द्वारा सत्तर के दशक में लिखी गई थी । और उस समय की चर्चित कहानी है । इस कहानी में मात्र एक योगी शिबानन्द जी की पुस्तक से प्रभावित
होकर एक युवक का जीवन ही बदल जाता है । जीवन में संयम । सहनशीलता । स्वीकारना । और समझौता किस तरह से किया जाय । ये इस कहानी से बेहतर जाना जा सकता है । योग साधना के लिये प्रेरित करती और जीवन में उच्च आदर्श सिखाती एक बेहतरीन कहानी ।...


जिस दिन स्वामी शिवानंद की किताब अरुणाभ के घर आई । उसी दिन दिव्येंदु भी अरुणाभ के घर आया । स्वामी शिवानंद की उस किताब का नाम था । प्रक्टीकल लेसन इन योगा । क्राउन साइज के पेपर बेक संस्करण वाली अंग्रेजी में लिखी गई इस किताब में शिवानंद के जीवन । दर्शन । योग । साधना । समाधि और ईश्वर उपलब्धि के बारे में विस्तृत जानकारी दी गई थी । 
दिव्येंदु जिसकी लंबाई पाँच फुट चार इंच तथा आँखों पर ज्यादा पावर के चश्मे लगाए हुए एक हष्टपुष्ट । काला कलूटा प्राइवेट छात्र जिसे कास्टग की परीक्षा देनी थी । वह प्रेशर कुकर में खुद अपना खाना बनाता था । वह बहुत दुखी रहता था । इस वजह से वह दया का पात्र था । रहन सहन उसका इतना साधारण था कि विश्वास नहीं किया जा सकता था । 
आज के जमाने में भी वह अपने सिर के बालों को बहुत छोटा छोटा कटवाता था । और उन कम बालों में तेल ज्यादा लगाता था । पहनने में वह अपने लिए प्रयोग करता था । चौदह इंच लंबी मोरी की बेलबॉटम पैण्ट । एक संस्था में वह एकाउंट क्लर्क के रुप में कार्यरत था ।
मगर अरुणाभ की तुलना न तो शिवानंद के साथ की जा सकती थी । और ना ही दिव्येंदु के साथ । अरुणाभ एक टेक्निकल एडवाइजर के रुप में काम करता था । वह लंबे लंबे बाल रखता था । तथा एक बोहिमियान की भाँति इधर उधर भटकता रहता था ।
यहाँ तक कि वह अपनी नौकरी की भी परवाह नहीं करता था । और न ही भविष्य के लिए सपने देखता था । वह किसी के घर में पेइंग गेस्ट के रुप में रहता था । भगवान के अस्तित्व के बारे में वह किसी से तर्क वितर्क नहीं करता था । उसके जीवन की सबसे बड़ी बात थी । वह अपने आपको किसी नियम और अनुशासन के ढाँचे में बाँधकर नहीं रखता था । 


मगर वह कहानी कविता लिखने का शौकीन था । अरुणाभ की अपने बारे में एक अजीबोगरीब धारणा थी कि लोग उसे समझ नहीं पा रहे हैं । इसके अलावा उसके व्यक्तित्व में कुछ ऐसी चीजें है । जिसके कारण शुरु शुरु में लोग उसकी ओर आकर्षित होकर खिंचे चले आते हैं । 
लेकिन जैसे ही वे उसके पास आ जाते हैं । वैसे ही स्टैटिक इलेक्ट्रीसिटी के नियमों की भाँति उसके व्यक्तित्व का वह आकर्षण इस तरह शून्य हो जाता है कि सामने वाले वे लोग केवल उससे दूर भाग जाते हैं । वरन कभी कभी जानलेवा शत्रु भी बन जाते हैं । 
इस वजह से अरुणाभ अधिकतम समय अकेले रहना पसंद करता है । अकेलापन उसकी साँसों में हमेशा के लिए बस गया है । तथा वही अकेलापन उसके खून और अस्थिमज्जा में हमेशा हमेशा के लिए घुल गया है । बिना अकेलेपन के क्या वह सहज ढंग से जिंदा रह पाएगा ? 
इस प्रश्न का हल खोजते खोजते वह कहीं खो जाता था । ठीक उसी अनसुलझे प्रश्न की तरह अरुणाभ के पास शिवानंद की किताब और दिव्येंदु दोनों एक साथ आए । इन दोनों को लेकर अरुणाभ दुविधा में पड़ गया था । क्योंकि उन दोनों का उसकी जीवन पद्धति के साथ तालमेल नहीं बैठता था । बचपन से ही योग साधना में अरुणाभ की कोई रुचि नहीं थी । मगर अभी योग साधना करने वाले अपने एक दोस्त का सानिध्य पाकर उसका इस तरफ झुकाव हो गया था । उसके मन में एक आकांक्षा पनपी थी । भले उसे ईश्वर प्राप्ति नहीं हो । मगर सार्वभौमिक सत्ता का लेशमात्र अनुभव भी उसके जीवन को सार्थक बना देगा । 
जीवन के उसी संक्रमण काल में दिव्येंदु उसके पास आकर कहने लगा था । उसे कॉस्टग का इम्तिहान देना है । उसे कहीं पर एक अच्छा घर नहीं मिल पा रहा है । इधर कंपनी भी उसे क्वार्टर नहीं दे रही है । अगर उसे कोई आपत्ति नहीं हो तो वह उसके साथ रहेगा । अरुणाभ के लिए यह बड़ी दुबिधा की घड़ी थी । क्योंकि वह जानता था कि उसका किसी के साथ एडजस्ट होकर चलना बहुत मुश्किल है । इतना होने के बावजूद भी वह दिव्येंदु को उसके मुँह पर मना नहीं कर पाया ।
अगले दिन उसने बाजार से शिवानंद की किताब खरीदी । उसी दिन दिव्येंदु अपने टेबल । खाट । बिछौने । बेडिंग । बक्से । रसोई के सामान । किताबें । कॉपियों सहित पहुँच गया था । अरुणाभ के घर । एक तरफ शिवानंद की किताब अरुणाभ के मन पर अपना अधिकार जमाने लगी थी । दूसरी तरफ दिव्येंदु अरुणाभ के घर पर अपना अधिकार जमाने लगा था ।
अरुणाभ का क्वार्टर एक फ्लैट के ऊपर वाली छत पर स्थित था । वह फ्लैट राऊरकेला शहर के मध्मवर्गीय परिवारों के लिए आकर्षण का एक केन्द्र था । उसके क्वार्टर में दो कमरे थे । अगर एक कमरे को बेडरुम तथा दूसरे को ड्राइंग रुम कहने से कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी । 
इन दो कमरों के बीच एक खाली जगह थी । वह जगह डायनिंग हॉल के काम में आती थी । मगर उस जगह में केवल एक डायनिंग टेबल ही रखा जा सकता था । इसके अलावा इस क्वार्टर में लेट्रिन । बाथरुम । किचन आदि की सुबिधा थी । वहाँ के लोग इस तरह के क्वार्टर को वनबीआर ( वन बेडरुम ) टाइप का क्वार्टर कहते थे ।
दिव्येंदु ने आते ही पहले बेडरुम से अरुणाभ की खटिया को बाहर निकालकर ड्राइंग रुम में रख दिया । और अपनी खटिया को बेडरुम में बिछा दिया । इस खटिया के पास एक सेंट्रल टेबल और दो कुर्सी लगा देने के बाद और एक खटिया रखने की जगह नहीं बच पा रही थी । फिर दिव्येन्दू ने आदेश देने के लहजे में अरुणाभ से कहा । ड्राइंग रुम में उसको सोने में कोई परेशानी तो नहीं है ?
उसकी बात सुनकर अरुणाभ के दिल को ठेस जरुर लगी । मगर उसका स्वभाव इस तरह का था कि वह मुँह खोलकर किसी का विरोध नहीं कर पाता था । इस कारण वह दिव्येंदु को भी कुछ नहीं बोल पाया । अरुणाभ की किताबें । कहानियों की पांडुलिपि । पत्र पत्रिकाओं से भरे रेक को एक कोने में खिसकाकर उसने अपने कोर्स की किताबों को उस जगह पर सजा दिया । 
बेडरुम की दीवार पर लटक रहे अरुणाभ के कपड़ों को उतारकर उसने ड्राइंगरुम की दीवार पर टंगे एक हैंगर पर लटका दिया । तभी अरुणाभ के मुँह से चूं तक नहीं निकली । वह अच्छी तरह समझ गया था कि आज के बाद उसको उसके ही घर में एक शरणार्थी की तरह रहना पड़ेगा ।
ड्राइंगरूम में पहले ही दिन से अरुणाभ को कई कष्टों का सामना करना पड़ा । दिन रात वहाँ मच्छरों की भरमार तथा तेज गर्मी से वह असुलाने लगा । सीलिंग फैन तो केवल बेडरुम में ही लगा हुआ था । ड्राइंग रुम में मच्छरदानी लगाने से गर्मी लगने लगती थी । और अगर मच्छरदानी नहीं लगाई जाए तो मच्छर काट काटकर हालत खराब कर देते थे । उसकी यह दशा देखकर दिव्येंदु ने अरुणाभ को बेडरुम में सो जाने के लिए कहा था । उसके लिए उसने अपने टेबल चेयर एक तरफ खिसकाकर फर्श पर दरी बिछा दी थी । मगर वहाँ सोने के लिए अरुणाभ ने इंकार कर दिया था । 
क्योंकि उसका मन इस बात के लिए गवाही नहीं दे रहा था कि दिव्येन्दु खाट के ऊपर सोएगा । और वह घर का मालिक होकर भी नीचे फर्श पर बिछी हुई उस दरी पर जिसके पास दिव्येंदु की चप्पलें रखी गई होगी । उसका यह व्यवहार तो उसे ऐसे लग रहा था मानो वह उसके घर का एक नौकर हो । उसे यह सब बेहद अपमानजनक लग रहा था । मगर दिव्येंदु ने इन सब बातों को इस तरह बेफिक्र होकर कहा था । जैसे उसके इस प्रस्ताव से अरुणाभ को दुखी होने का कोई सवाल ही नहीं उठता है ।
उस दिन दुखी होकर अरुणाभ अपनी खटिया । बिछौने । मच्छरदानी समेत शिवानंद की किताब को लेकर छत के ऊपर सोने के लिए चला गया । सोने से पूर्व कुछ न कुछ पढ़ने की आदत थी उसकी । छत पर अंधेरा होने की वजह से जबरदस्ती वह सोने की चेष्टा करने लगा । मगर उसे नींद नहीं आ रही थी । तब नीचे जाकर उसने एक मोमबत्ती जलाई और उसे जलाकर खाट के पैर के ऊपर सावधानी से रखा । 
फिर मच्छरदानी के भीतर घुसकर ध्यानपूर्वक शिवानंद की किताब पढ़ने लगा । मगर बीच बीच में उसका ध्यान दिव्येंदु द्वारा किए जा रहे दुर्व्यवहार की तरफ चला जाता था । यह सोचकर उसका मन दुखी हो रहा था । इसी दौरान उसकी नजर शिवानंद की एक कविता के ऊपर पड़ी । कविता की पहली पंक्ति इस प्रकार थी ।
एडॉप्ट । एडजस्ट । एकमोडेट । बीयर इन्सल्ट । बीयर इन्जूरी । दिस इज द हाईएस्ट साधना ।
शिवानंद जी की इन पंक्तियों को पढ़कर अरुणाभ इस तरह प्रभावित हो गया था कि वह केवल इन्हीं पंक्तियों को बारम्बार दोहरा रहा था । यहाँ तक साधना को करने के लिए मानसिक रुप से तैयार भी हो गया था ।
भले कुछ हो या न हो । 
शिवानंद की किताब अरुणाभ के जीवन में एक अनुशासन को ले आई । तथा दिव्येंदु के आने ने घर की स्वच्छता को एक नया मोड़ प्रदान किया । कभी अरुणाभ के स्वभाव में अनुशासन का नामोनिशान नहीं था । ना ही खाने में । ना ही नहाने में और ना ही कहानी लिखने में । कभी कभी तो ऐसा भी होता था कि वह अपने बिछौने तक नहीं समेटता था । और यहाँ तक कि घर में झाडू लगाने जैसे रोजमर्रा के काम करना या तो वह भूल जाता था । या फिर उनकी अनदेखी कर देता था । 
वहीं अरुणाभ आजकल पूरी तरह बदल गया था । आजकल वह सुबह चार बजे उठने लगा था । शिवानंद की किताब में जैसे जैसे निर्देश दिए गए थे । ठीक वैसे ही उनके अनुकरण करता था । यहाँ तक बिना दंतमंजन किए तथा बिना स्नान किए एकाग्रता के लिए ध्यान की मुद्रा में बैट जाता था । केवल मुँह धोकर ही । मगर ध्यानावस्था में उसका बेलगाम मन इधर उधर भटकता था । 
छुट्टी होने पर स्कूल से लौटते हुए बच्चे की तरह । अरुणाभ यह कहकर अपने मन को सांत्वना देता था । कभी न कभी वह दिन जरुर आएगा । जब उसका मन स्थिर हो जाएगा । तथा ध्यान लगने लगेगा । यही सोचकर वह अपनी कोशिश जारी रखता था ।
दिव्येंदु के आने से उनका घर एक आदर्श घर की भाँति तरोताजा लगने लगा था । 
पहले की तरह अभी उसे अपने घर में बिखरी हुई किताबें तथा फर्श पर इधर उधर गिरे सिगरेट के टुकड़े देखने को नहीं मिल रहे थे । छत के कोनों पर मकड़ी के जाले भी नजर नहीं आ रहे थे । तथा पंखे की पंखुडियाँ भी साफ साफ दिखने लगी थी । आजकल घर में दो बार झाडू लगाया जाता था । इतना कुछ होने के बाद भी अरुणाभ को ऐसा लग रहा था । जैसे वह भीतर से टूट गया हो । और उसका ये घर अब उसका नहीं रहा हो । वह अब एक शरणार्थी की भाँति जिंदगी जीने लगा है । 
जिसका मुख्य कारण था शिवानंद की वह कविता । अरुणाभ मन ही मन उस कविता को दोहराता रहता था । एडॉप्ट । एडजस्ट । अकमोडेट । बीयर इन्सल्ट । बीयर अन्जूरी । दिस इज द हाईएस्ट साधना । जिस दिन से उसने कविता पढ़ी थी । उसी दिन से अरुणाभ दिव्येंदु के साथ एडजस्ट करने की कोशिश कर रहा था । इसी वजह से उसने आज तक दिव्येंदु के स्वार्थी स्वभाव के खिलाफ अपना मुँह नहीं खोला । उस दिन से ही वह सोने लगा । रात को कभी छत के ऊपर । कभी ड्राइंग रुम के अंदर गर्मी के भीतर । वह सारे कष्टों को इस तरह सहन किए जा रहा था । मानो वे कष्ट उसके लिए बिल्कुल असहय नहीं रहे ।
अरुणाभ अपनी पढ़ाई लिखाई के लिए दिव्येंदु के टेबल का उपयोग करता था । एक तरफ दिव्येंदु बैठता था । तो दूसरी तरफ वह स्वयं । दिव्येंदु की आदत थी । रात को ग्यारह बजे तक पढ़ने की । उसके बाद वह कमरे की लॉइट बंद करके सो जाता था । क्योंकि उसे अंधेरे में सोना पसंद था । जबकि अरुणाभ की कोई नियत समय सारणी नहीं थी । वह कभी रात को आठ बजे सो जाता था । तो कभी पूरी रात कहानी लिखता रहता था ।
एक दिन की बात है । रात के ग्यारह बज रहे थे । टेबल पर बैठकर दोनो पढाई कर रहे थे । दिव्येंदु के सोने का समय हो गया था । जबकि अरुणाभ कहानी लिखने में व्यस्त था । जब दिव्येंदु से रहा नहीं गया । तो उसने कमरे की लाइट बुझा दी । तथा अपने बिस्तर पर सोने चला गया । यह कहते हुए । अरुणाभ । मुझे जोरो से नींद आ रही है । तुम दूसरे कमरे में जाकर अपनी कहानी लिखो ।.. कृमशः ( कहानी का दूसरा भाग इसी के साथ प्रकाशित है । ब्लाग की साइड पर देखें । )

3 टिप्‍पणियां:

RAJEEV KUMAR KULSHRESTHA ने कहा…

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anjeev pandey ने कहा…

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anjeev pandey ने कहा…

क्या पत्नी के बिना किसी प्रकार की शारीरिक-मानसिक व्याधि का सामना करना पड़ता है. अगर हां तो इसका निदान क्या हो सकता है.

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